रविवार, 9 अगस्त 2015

बीजेपी के भाग से बिहार का छींका टूटेगा ?


गया के गांधी मैदान से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के लोगों को विकास के खूब सपने दिखाए. सपने भी दिखाए और बिहार की नीतीश सरकार को जमकर कोसा भी...मोदी ने कहा 25 साल से इन्हीं लोगों ने बिहार पर राज किया है और नतीजा ये कि बिहार दिन पर दिन पिछड़ता चला गया । हालांकि भाषण देते वक्त पीएम मोदी ने इस बात को जानबूझकर भुला दिया कि बिहार में नीतीश कुमार के साथ कंधा मिलाकर बीजेपी ने भी करीब 8 साल गठबंधन की सरकार चलाई है। मोदी ने कहा कि बिहार अभी भी बीमारू राज्य है और राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह अगर बिहार को भी इस सूची से बाहर लाना है तो यहां भी बीजेपी की सरकार बनवानी होगी। मोदी के दावे पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने पलटवार किया है, दावे को गलत बताते हुए उन्होंने कहा है कि बिहार अब बीमारू राज्य नहीं है, नीतीश ने पूछा कि क्या केंद्र केवल उन्हीं राज्यों को मदद करेगा जहां उनकी पार्टी की सरकार है ।
पीएम मोदी ने कहा दिल्ली से विकास की गंगा लगातार बिहार की तरफ बह रही है लेकिन नीतीश सरकार तो उल्टा लोटा लिए खड़ी है जो इससे कुछ हासिल ही नहीं कर रही है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालू यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार में जंगलराज- 2 शुरू हो रहा है और जेल से बुरी बुरी चीजें सीख कर लौटे लोगों के जरिए जहर फैलाया जा रहा है । मोदी के जेल वाले इस बयान पर लालू यादव और नीतीश कुमार ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को लपेट लिया , लालू ने पूछा है कि अमित शाह जेल से क्या सीख कर लौटे थे एक बार उन्हीं से पूछ लें । बीजेपी की आंखों की किरकिरी बन चुके नीतीश और लालू के गठबंधन पर भी पीएम ने निशाना साधा, पीएम ने पूछा जिन लोगों ने अभी जहर पिया है वो बाद में किसपर निकालेंगे । दरअसल बिहार में नीतीश से गठबंधन के बाद लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि उन्होने जहर पिया है, नीतीश के चंदन और भुजंग वाले बयान को लेकर भी मोदी ने तंज कसते हुए पूछा कि कौन चंदन कुमार है और कौन भुजंग प्रसाद मुझे तो पता ही नहीं। दरअसल बिहार में नीतीश और लालू की दोस्ती बीजेपी के लिए एक नई मुसीबत बन कर खड़ी हो गई है, उसका बिहार में जीत का सपना धुंधलाने सा लगा है लेकिन बीजेपी को अभी भी उम्मीद है कि किसी तरह बिल्ली के भाग से गठबंधन का छींका टूट जाए जिससे बिहार की मलाई एक बार उसे अकेले चट करने का मौका मिल सके, हालांकि लालू और नीतीश की जोड़ी उन्हें ये मौका देगी इसमें थोड़ा संदेह है।

सोमवार, 3 अगस्त 2015

फर्स्ट डिवीजन की मौत !

IIT रुडकी के छात्र महीने भर के ड्रामे के बाद आखिर वापस ले लिए गए....भले हालात कुछ दूसरे हों लेकिन जिस दिन से ये मामला सामने आया था उसी दिन से मुझे अपने वो दोस्त याद आने लगे जो करीब ३० साल पहले अचानक गुमनामी में खो गए, आज तक ना उनका कोई फोन आया ना किसी से उनके बारे में सुनने को मिला, क्या किया होगा, क्या उन्होने नदी में कूद कर जान दे दी होगी या किसी ट्रेन के नीचे लेट गए होंगे। अगर ऐसा हुआ होगा तो सिर्फ उस शख्स के पीछे जिसे छात्रों के भविष्य ये ज्यादा अपने स्कूल की झूठी इज्जत की चिंता थी। कहानी लखनऊ के एक नामी स्कूल से जुड़ी है नाम बताना उतना जरूरी इसलिए भी नहीं क्योंकि जिन तक ये बात पहुंचानी है उनको इसमें अपनी आत्मा जरूर दिख जाएगी, हां तो १९८५ के आसपास की बात होगी, नौवीं पास कर हम दसवीं में गए थे, हमें सुबह ८ बजे से शाम ६ बजे तक स्कूल नें ही पढना होता था, पढने के बजाय घोटा लगाना कहें तो ज्यादा सही होगा, क्योंकि हाईस्कूल की पढाई के लिए कितनी देर पढने की जरूरत होती है.......लेकिन हमारे स्कूल में तो कुछ बच्चों को तस्कूल में ही बिस्तर तक लगवा दिए गए, और जो बच्चे इसके बाद भी तोतों को रटाने वाले रिंग मास्टरों को कम से कम फर्स्ट डिवीजन लाने का भरोसा नहीं दिला पाए उन्हें स्कूल छोडने का आदेश सुना दिया गया, इनमें से कई केजी नर्सरी से इसी स्कूल में पढ रहे थे, बहुत रौए गिडगिडाए, उन्ही मां बापों ने आकर उनके पांव भी पकडे जिन्हे तराजू में फल फूल से तौलने का स्कूलवाले ढकोसलेबाज नाटक रचते थे, लेकिन विश्व शांति का लबादा ओढकर घूम रहे मार्केटियरों को जरा भी दया ना आई, २५-३० बच्चों को एक झटके में निकाल दिया गया, आखिर क्यों किस बात का गुरूर था उन्हें, छटनी पहले पांचवीं में, फिर आठवीं में, फिर नवीं में ......फिर भी दिन रात रटाने वाले बच्चों को भी अपनी उम्मीदों पर ढाल नहीं सके तो ये बच्चों की नहीं रिंगमास्टरों की गलती है, जिस लडके ने हाईस्कूल में पूरे यूपी में टॉप किया वो अगले साल फर्स्ट डिवीजन भी नहीं ला सका, गलती उस लडके में नहीं स्कूल के सिस्टम में थी, इधर बीच सेशन में निकाले गए लडकों को कहीं दाखिला मिल नही सकता था, सो लोग मारे मारे घूमते रहे साल बरबाद हुआ होगा, कुछ इस जिल्लत में आत्मा से मर गए होंगे, कुछ नफरत की आग में जल गए होंगे, ३० साल बाद नाम तो किसी के याद नहीं लेकिन उनके वो दर्द भरे चेहरे आज भी याद हैं, इव सब के कत्ल का जिम्मेदार जो भी हो उसे ईंट पत्थर की अदालतों में शायद सजा ना दी जा सके लेकिन कुदरत उनका इंसाफ जरूर करे, जिन मां बापों की आंखों के सपने छिने उनके गुनहगारों को कुदरत वैसी ही सजा दे। स्कूल के मेरे कुछ दोस्तों कुछ अध्यापकों को शायद मेरी बातें अच्छी ना लगें उनसे मैं माफी चाहता हूं लेकिन क्या करूं फर्स्ट डिवीजन का शोकेस लगाकर अपनी दुकान चमकाने और बचपन की हत्या करने वालों का असली चेहरा भी तो सामने लाना जरूरी है। स्कूल के २०० बच्चों में से छाटकर १०० बच्चों को अव्वल दिखाना कोई बड़ा काम नहीं है, हम तो तुम्हें तब गुरु मानेंगे जब सारे २०० बच्चों को तुम अव्वल वाले मुकाम पर पहुंचा दोगे।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

जब राजेंद्र यादव को कसाई बना दिया था मैंने…. !

दिल्ली- नोएडा के बीच आपको सुबह-शाम यात्रा करनी हो तो किसी सरदर्द से कम नहीं, भयंकर जाम हर सड़क पर मिल जाएगा, किसी तरह मोटरसाइकिल से दफ्तर पहुंचा तो साढे नौ बज रहे थे, अपनी सीट पर पहुंचा..टीवी बंद पड़ा था, ऑन किया 9.30 की हेडलाइन चल रही थी, आखिरी हेडलाइन आते आते टीवी ऑन हुआ तो सामने देखा राजेंद्र यादव जी के ना रहने की दुखद खबर थी...अरे मुझे सुबह से तो पता ही नहीं चला.. ओह याद आया आज सुबह से घर पर लाइट नहीं थी, इन्वर्टर 42 इंच के टीवी का लोड लेते ही ट्रिप होने लगता है इसलिए चाहकर भी टीवी नहीं खोला था....मैंने अपने सहकर्मी से तस्दीक की- ...अरे राजेंद्र यादव जी नहीं रहे ....यकीन नहीं हो रहा मुझे आज दिन भर वो दिन याद आता रहा ...जब मैं राजेंद्र यादव जी से पहली बार मिला था, और पहली बार में ही अपने अंदर उनकी जो छवि मैंने बना रखी थी, उनके सामने उसे पेश कर दी, वो भी एक कार्टून के रूप में, उस कार्टून में उनपर जबरदस्त कटाक्ष था, फिर भी उन्होंने बड़े ही प्यार से उसपर दस्तखत किए और मुझे प्यार से लौटाया ये कहकर कि इसकी एक फोटो कॉपी उन्हें भी दे दूं । आज मैं अपने पुराने कागजों में वो कार्टून ढूंढ रहा था लेकिन अभी तक मुझे मिला नहीं। बात उन दिनों की है जब मैं आईआईटी कानपुर में टेलिविजन सेंटर में ट्रेनिंग कर रहा था, साहित्य की रुचि मुझे शुरू से ही थी आईआईटी में तो माहौल ही अलग था, साहित्य तो दूर की चीज थी राजनीति की चर्चा भी कम ही सुनाई पड़ती थी, एक लेक्चर हॉल से दूसरे हॉल के बीच साइकिल पर घूमते प्रोफेसर और छात्र एल्फा, बीटा, गामा की लेन में ही रोबोट की तरह चलते नजर आते थे। लेकिन एक प्रकृति के लोग जब एक जगह होते हैं तो मिल ही जाते हैं ऐसा ही हुआ, उन दिनों में आईआईटी में साहित्यकार गिरिराज किशोर जी भी थे, वो क्रिएटिव राइटिंग विंग के सर्वे सर्वा थे, उन्होने एक हिंदी कविता कार्यशाला का आयोजन किया था, रजिस्ट्रार दफ्तर के पास दीवार पर चिपके नोटिसों में से ये नोटिस चिपका देखकर मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि आईआईटी जैसे माहौल में भी कोई कविता, कहानी की बात कर सकता है, इसी कार्यशाला में से मुझे 2-4 दोस्त ऐसे मिले जो आईआईटी से एमटेक या पीएचडी कर रहे थे, उनमें मिलकर मुझे पता चला कि भले वो कंप्यूटर की मशीनी भाषाओं कोबोल, यूनिक्स के बीच रहते हों लेकिन उनके दिल में साहित्य जिंदा था। धीरे धीरे मैं भी 3-4 लोगों के साथ मिलकर मशीनी दुनिया के दोस्तों के साथ साहित्य की पौधों को रोपने लगा था। आईआईटी में हिंदी साहित्य का कारवां यहीं से शुरू हुआ- गिरिराज किशोर जी से मिलकर राजेंद्र यादव, नरेश सक्सेना जैसे तमाम साहित्यकारों को आईआईटी में बुलाया जाने लगा ताकि यहां के छात्र उनसे मिलजुलकर साहित्य के बारे में जान सकें। राजेंद्र यादव जी के आने की खबर हमें पहले से थी, मैं हंस का नियमित पाठक था, भले खरीद कर नहीं पढ़ता था, लेकिन हॉल -4 के रीडिंग रूम में रखी हर हंस का अंक मैंने पूरा पढ़ा था। उस दन गेस्ट हाउस में हम लोग शाम के वक्त राजेंद्र जी से मिलने पहुंचे, बातचीत शुरू हुई .... हम लोग अपनी जिज्ञासाएं उनके सामने रख रहे थे वो बड़े ही प्यार से हमारी बातों का जवाब दे रहे थे, मैं बातचीत नोट भी कर रहा था, लेकिन मेरे नोट पैड के बीच रखा कार्टून बार बार सामने आने को बेताब हो रहा था, मुझे डर भी था कि कार्टून देखते ही वो नाराज हो सकते हैं इसलिए पहले ही तय कर लिया था कि कार्टून कांड सबसे आखिर में ही किया जाए। हमने राजेंद्र जी को शॉपिंग सेंटर में बने एकमात्र रेस्टोरेंट में डिनर के लिए भी मना लिया था। डिनर के बाद हम गेस्ट हाउस फिर लौट आए, राजेंद्र जी ने अपना सिगार फिर सुलगा लिया था...अब वो बेड पर अधलेटे से थे और हम चारों लोग कुर्सियों पर बैठे थे ....जब मैं आश्वस्त हो गया कि राजेंद्र जी हम लोगों से काफी घुल मिल गए हैं तो मैंने बड़ी हिम्मत कर राजेंद्र जी से धीरे से कहा कि मैंने आपका एक कार्टून बनाया है आप देखना चाहेंगे...मैंने कार्टून निकालकर उनकी ओर बढ़ा दिया....पहले वो चौंके फिर देरतक देखने के बाद मुस्कुराए...और बोले...ओह तो आप मुझे इस नजर से देखते हैं...तुमने तो मुझे कसाई ही बना दिया और फिर जोर से हंसे...ओह तो आपने मुझे कसाई ही बना दिया... ! दरअसल हंस पढ़कर मुझे पता नहीं क्यों लगता था कि इसमें अश्लीलता का पुट जानबूझकर डाला जाता है, मुझे लगता था कि प्रेमचंद्र जी के हंस को राजेंद्र जी ने अश्लील बना दिया है, मैंने जो कार्टून बनाया था उसमें लकड़ी के एक गोल बेस पर एक हंस को दोनों पैरों पर खड़ा बनाया था....बगल में राजेंद्र यादव एक बड़ा चाकू लेकर खड़े हैं और हंस के दोनों पंख कटे नीचे पड़े हैं...हंस के दोनों स्तनों को देखकर राजेंद्र जी मुस्कुरा रहे हैं.. राजेंद्र जी ने उसके बाद हमें प्यार से समझाया कि साहित्य में वो सबकुछ होना जायज है जो हमारे समाज में है, जो हमारे समाज से घट रहा है अगर वो साहित्य में दर्ज हो रहा है तो इसमें हर्ज क्या है, आइने का और क्या काम होता है। राजेंद्र जी ने उस कार्टून पर दस्तखत किए और मुझसे कहा कि इसकी एक कॉपी उन्हें भी दे दूं...मैं दूसरे दिन एक डाक्यूमेंट्री शूटिंग के सिलसिले में बाहर चला गया और उन्हें कॉपी नहीं दे पाया, हालांकि बाद में मैंने उन्हे कोरियर से कॉपी भिजवाई पता नहीं उन्हें मिली थी या नहीं ....!

शनिवार, 3 जुलाई 2010


कीशू भाया, कीशू भाया
बिस्किट खाया
दूध पिलाया;
फिर क्यों शोर मचाया ?
कीशू भाया, कीशू भाया
फिर क्यों शोर मचाया
तुमको मैंने खूब घुमाया
लोरी गाकर तुम्हें सुलाया
फिर क्यों शोर मचाया ?
कीशू भाया..कीशू भाया
फिर क्यों शोर मचाया ?
- गौरी
( ये कविता मैंने अपने भाई आदित्य के लिए

बड़े पापा के साथ मिलकर बनाई, और डैडी से लिखवाई)

सोमवार, 14 जून 2010

पहले व्यवस्था का प्रदूषण दूर करना होगा...!!


हिंदुस्तान की करोड़ों जनता की श्रद्धा जिस पतितपावनी गंगा मां पर है वो गंगा दिन पर दिन मैली क्यों होती जा रही है- समाजसेवी, सरकार और संत सब कितना भी रुदन कर लें गंगा नदी को गंदे नाले में बदलने में किसी के हाथ हिचक नहीं रहे । आखिर क्यों , गंगा क्यों साफ नहीं हो पा रही, कभी अमृत कहा जाने वाला गंगा का पानी आखिर क्यों जहर बन गया है। वजह बताने से पहले मैं आपको अपना छोटा सा अनुभव सुनाता हूं -

बात 1997 की है – मैं गंगा के बढते प्रदूषण पर एक स्टोरी करने कानपुर गया था – तमाम जगह घूम-घूमकर इसी हश्र पर पहुंचा कि हम तो गंगा की सफाई की बात करके सिर्फ पेड़ की जड़ धो रहे हैं , पेड़ की टहनियों और शिखाओं पर जमा प्रदूषण घुलघुलकर फिर जड़ों में पहुंच जाता है। सबसे पहले हम पहुंचे गंगा तट पर बनाए गए बिजली से चलने वाले शवदाह गृहों में। ये शवदाह गृह लाखों रुपये खर्च कर इसलिए बनाए गए थे कि लोग शव गंगा में ना बहाएं और प्रदूषण कम हो सके। लेकिन वहां पहुंचने पर पता चला कि रखरखाव की कमी के चलते ये शवदाह गृह पिछले दो बरसों से बंद पड़ा है। लाखों की कीमत से बना शवदाह गृह खुद अर्थी पर पड़ा था और घूसखोर लापरवाह अफसरों का इस पर एक बार भी ध्यान नहीं गया।

दूसरा वाकया एक लेदर टेनरी का था, वहां पहुंचकर जो देखा सुना लगा कि शायद ही गंगा कभी साफ हो पाए। कानपुर में टेनरी उद्योग से सबसे ज्यादा जहरीला तत्व गंगा में गिरता है, 200 से 300 के करीब इन टेनरी यूनिट्स में चमड़े को साफ किया जाता है, हर रोज सैकड़ों टन जहरीला कचरा गंगा में गिरता है, जाहिर है सरकार ने दिखाने को कुछ ना कुछ काम किए जरूर हैं मसलन अदालत के आदेश पर हर टेनरी में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं। फिर आखिर वजह क्या है कि ट्रीटमेंट प्लांट के बाद भी गंगा मैली हो रही है यही जिज्ञासा मेरे मन में भी थी। मैं टेनरी में घुसा तो लोगों में कोई खास प्रतिक्रिया नही हुई, कैमरा देखकर भी कोई नहीं घबराया। टेनरी का मालिक आया , बातचीत हुई वो हमें ट्रीटमेंट प्लांट पर ले गया। मैंने कहा ट्रीटमेंट प्लांट के बावजूद गंगा मैली क्यों हो रही है – वो बोला अब ये हम क्या बता सकते हैं।
मैने पूछा अभी क्या काम चल रहा है
हां..हां चल रहा है जी 24 घंटे काम चलता है
अच्छा ट्रीमटमेंट प्लांट से आवाज नहीं आ रही
...नहीं साहब ये नहीं चलता ...
क्यों..
अरे साब कोई फायदा हो तब
ना
क्यों
अरे पहले चलाता था ...तो इलाके का पॉल्यूशन इंस्पेक्टर आकर कहता था कि पैसे दो नहीं तो .यूनिट सील करवा दूंगा कि ट्रीटमेंट प्लांट नहीं चलता
मैंने समझाया कि साहब प्लांट तो पूरा टाइम चलता है
बोला – इससे मुझे मतलब नहीं मुझे तो पैसा चाहिए, किसने कहा ट्रीटमेंट प्लांट चलाओ ...बस मुझे ट्रीट करते रहो सब ठीक रहेगा
मुझे ट्रीट नहीं किया तो चाहे जितना प्लांट चलाओ लिख दूंगा प्लांट नहीं चलता और बंद करवा दूंगा पूरा कारखाना
फिर उसे 10 हजार रुपये दिए...जाते समय कंधे पर हाथ रखकर मुझसे बोला- मियां काहे बिजली बरबाद करते हो देश में वैसे भी बिजली की कमी है प्लांट चलाकर 15 हजार का बिल देते हो 10 हजार मुझे दे दो , पांच हजार की तब भी बचत है ना...हंसते हुए बोला – सरकार कहती है बिजली बचाओ...आप लोग समझते ही नहीं....अब बताइये गंगा मइया कैसे साफ रहेंगी जब ऐसे मलेच्छ अफसर भरे पड़े हैं – टेनरी मालिक झनझनाकर बोला

मेरे पास कोई उत्तर नहीं था...बड़े गुस्से में आकर रिपोर्ट बनाई ...टीवी पर प्रसारित हुई इलाके के 3 इंस्पेक्टर और अफसरों का तबादला कर दिया गया, नए अफसर आ गए लेकिन गंगा का प्रदूषण अब भी कम नहीं हुआ, मुझे फिर कानपुर जाकर टेनरी और ट्रीटमेंट प्लांट की पड़ताल का मौका नहीं मिला है लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि सिस्टम का प्रदूषण अभी भी कायम है , है कोई इसे खत्म करने वाला।

सोमवार, 7 जून 2010

मजबूरी में पत्रकार नहीं बना मैं....

मैं पत्रकारिता के पेशे में मजबूरी से नहीं आया था, ऐसा नहीं था कि पहले इंजीनियरिंग की कोचिंग की फिर आईएएस के लिए ट्राई किया और जब कहीं सफलता नहीं मिली तो मजबूरी में रोजी रोटी चलाने के लिए पत्रकार बन गया। आज पत्रकारिता में बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन मेरा मामला ही कुछ अलग था। बीएससी की पढाई करते-करते दर्जन भर अखबारों में लिखने के अलावा एक हिंदी अखबार में रिपोर्टिंग का काम भी मिल गया था। क़ॉलेज से छूटने के बाद जब साथी सिनेमाघरों का रउख करते तब मैं अखबार के दफ्तर में बैठकर खबरें लिखता और पहले शाम फिर देर रात तक घर लौटने लगा। मेरे पिता जी पेशे से पशु चिकित्सक हैं चाहते थे कि मैं डॉक्टर या इंजीनियर बनूं लेकिन मैने उन्हे मना कर दिया कि इनमें मेरी कोई खास रुचि नहीं है। पिताजी ने बीएससी खत्म होते ही एक महंगे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग कोर्स में दाखिला करवा दिया, अब इतनी फीस दी थी तो कोर्स पूरा किया और जितना खर्च हुआ था उतना कंप्यूटर से कमा कर दे दिया और कंप्यूटर को बाय बोल दिया - 0 से 9 के बीच मैं सारी जिंदगी काट नहीं सकता था ।

शनिवार, 15 मई 2010

मैं राजस्थान का शेखावत हूं......!!!

आज बीजेपी के एक युग का अंत हो गया, पूर्व उप राष्ट्रपति और राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके भैरों सिंह शेखावत का निधन हो गय़ा... आज पूरे दिन के बुलेटिन शेखावत जी को समर्पित रहे पूरे दिन बुलेटिन के दौरान मैं उन लम्हों को याद करता रहा जब मैं शेखावत जी से मिला था।
अपने पत्रकारिता के 15 साल के अनुभव में मेरा सामना कई खुर्राट नेताओं से हुआ शेखावत जी भी उनमें से एक रहे। बात 1996 की है उन दिनों मैंने जीटीवी में नौकरी करता था।
दिल्ली दफ्तर में नियुक्ति थी , लेकिन उन दिनों न्यूज चैनलों का नेटवर्क आजकल जैसा नहीं था इसलिए आसपास के राज्यों में भी मैं दिल्ली से ही स्टोरी कवर करने जाता था। राजस्थान मेरी पसंदीदा कर्मभूमि थी, वजह दिल्ली से नजदीकी दूसरे राजस्थान के शहरों की स्टोरी विजुअली बड़ी रिच होती थीं।
मैं दो चार स्टोरी आइडिया तलाशता और कूच कर जाता राजस्थान के शहरों की ओर, जन्माष्टमी का दिन था, मैं जयपुर पहुंचा पूरे दिन एक स्टोरी पर काम किया था - स्टोरी थी जयपुर शहर की एतिहासिक जेल को शिफ्ट करके वहां पर व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने की- मैंने एतिहासिक इमारत वाला एंगल निकाला और दिनभर विजुअल इतिहासकारों और कांग्रेस नेताओं के इंटरव्यू किए, लेकिन अभी तो स्टोरी अधूरी थी सरकार की ओर से भी तो कोई बोलने वाला चाहिए था, रात के 11 बजे थे क्या करूं....पता नहीं कैसे हिम्मत हो गई, 11 बजे रात राज्य के मुख्यमंत्री भेरों सिंह शेखावत जी के घर के टेलीफोन की घंटी बजा दी। उधर से रौबीली आवाज में हैलो हुआ - मैंने कहा मैं जीटीवी से हूं शेखावत जी से बात करना चाहता हूं, अगर तकलीफ ना हो तो बात करा दें, उधर से आवाज आई बताइये बोल रहा हूं.....मैने कहा - मजाक मत कीजिए भैरों सिंह शेखावत जी से बात करा दीजिए, शेखावत जी बोले नहीं मजाक नहीं मैं भैरों सिंह शेखावत ही हूं, बताइये क्या काम है - मुझे विश्वास तो जरा भी नहीं था कि फोन पर दूसरी ओर शेखावत जी हैं लेकिन मैने बोलना शुरू कर दिया - मैंने कहा कि मैं दिल्ली से आया हूं, यहां की ऐतिहासिक इमारतों पर कुछ स्टोरी कर रहा हूं आपका इंटरव्यू चाहिए...
उधर से आवाज आई - नहीं भाई मैं रजत जी के लिए इंटरव्यू नहीं दे सकता
मैं चौंक गया - रजत जी को कोई मना कैसे कर सकता है
मैंने कहा- ऐसा क्यों
शेखावत जी बोले - रजत जी अपने प्रोग्राम में कहेंगे भैंरो सिंह शेखावत हाजिर हों एक मुजरिम की तरह बुलाएंगे मुझे ये मंजूर नहीं ... वो कई बार मुझे अपने प्रोग्राम के लिए बुला चुके हैं लेकिन मैं इसीलिए नहीं आता हूं
मैंने बड़ी विनम्रता से कहा - नहीं शेखावत जी, यहां कोई अदालत नहीं लगनी है बस एक दो विषयों पर
आपका वर्जन चाहिए। अगर बहुत व्यस्त ना हों तो
बोले- नहीं आप इतनी दूर से आए हैं आपको मना नहीं करूंगा, सुबह 10 बजे सेक्रेटियट आ जाइयेगा - डायरेक्टर इन्फोर्मेशन से संपर्क कर लीजिएगा। वहीं इंटरव्यू कर लेंगे नाश्ता भी साथ करेंगे।
दूसरे दिन सुबह मैं सेक्रेटियट पहुंचा, एक इन्फोर्मेशन आफिसर पहले से ही गेट पर रास्ता देख रहा था दिल्ली के नंबर की गाड़ी देखते ही लपक कर हमारे पास पहुंचा कहा जीटीवी से हैं
मैने कहा- जी
आइये डायरेक्टर साहब आपका इंतजार कर रहे हैं
तब मुझे भरोसा हुआ कि कल रात जिससे बात हुई वो सचमुच शेखावत जी थे
डायरेक्टर इन्फोर्मेशन के पास चाय पी और साढे दस बजे शेखावत जी के सामने साक्षात पहुंच गया
दुआ सलाम हुई...11 बजे इंटरव्यू के लिए सेटअप तैयार हो गया...तब तक मैने भी शेखावत जी के साथ नाश्ता किया जो थोड़ा तगड़ा हो गया, एक दिन पहले जन्माष्टमी के व्रत की भूख नाश्ते में ही मिटी ।
नाश्ते के दौरान शेखावत जी ने कहा कि मुझे लग नहीं रहा कि रात में तुम्ही से बात हुई थी अभी क्या उम्र है तुम्हारी....मैने उम्र तो नहीं बताई धीरे से बोला कलम के सिपाहियों को पहलवान होना जरूरी तो नहीं...जोर से हंसे बोले - अब यकीन हो गया तुम्ही थे
मूड अच्छा देखकर मैंने कहा कि सुबह 9 बजकर 59 मिनट तक मुझे भी नहीं लग रहा था कि आप से बात हुई, मैं सोच रहा था कि टेलिफोन ऑपरेटर ने हमें रात में बुद्धू बनाया , और आपके नाम पर बात की...
क्यों ?
मैने कहा- अरे किसी राज्य का मुख्यमंत्री कभी सीधे फोन उठाता है,
वो फिर जोर से हंसे
माहौल एकदम हल्का हो गया था...मेरा भी हौसला बढ़ गया था
सेट तैयार था
हम दोनों बैठे
रोल हुआ
मैने पहला सवाल ही पूरा जोर लगाकर उड़ेल दिया - शेखावत जी आप पर आरोप लग रहा है कि आप राज्य की सांस्कृतिक विरासत को मिटाने पर तुले हैं....मसलन जेल की ऐतिहासिक इमारत को शॉपिंग कॉम्पलेक्स बनाने जा रहे हैं।
मैं शेखावत जी का चेहरा देख रहा था सोच रहा था अच्छी बाइट मिलेगी....20 सेकेंड बीत गए वो मुझे घूरे जा रहे थे ...मैं सोच रहा था धीर गंभीर व्यक्ति थोड़ा सोच कर बोलते हैं .... 4 0 सेकेंड बीत गए
मैने टोका - शेखावत जी
शेखावत जी गरजे-
-" मैं यहां का शेखावत हूं मेरे ऊपर कोई आरोप नहीं लगाता "
मैं तो सन्न रह गया , यहां तो बात व्यक्तिगत होने लगी थी ...मेरी पहली ही बाउंसर पर राजनीति के माहिर ने स्वीप लगा दी थी
मैने तुरंत संभाला और अगली ही बॉल स्विंग करा दी कांग्रेस की ओर-
जी शेखावत जी , लेकिन कांग्रेस तो आपको पानी पी पी कर कोस रही है इस मामले में
तब जाकर कहीं शेखावत जी का रुख मेरी ओर से हटकर कांग्रेस की ओर हुआ
मुझे बाइट तो बहुत मजेदार मतलब हार्ड हिटिंग मिल गई थी लेकिन मन ही मन थोड़ा डर रहा था कि कहीं बॉस से कुछ शिकायत ना कर दें। फिर भी मैं थोड़ा संभलकर दनादन सवाल दागता गया और वो भी दनादन जवाब देते गए.... 10 मिनट में इंटरव्यू निपट गया
इंटरव्यू खत्म हुआ तो वो फिर पहले जैसे ही सामान्य हो गए...कोई मीटिंग थी जरूरी फिर भी उन्होने बैठकर अपने हाथ से हिदी में एक चिट्ठी लिखी रजत शर्मा के नाम, मैने सोचा जरूर मेरी शिकायत लिखी होगी, क्योंकि वो रजत जी के बहुत करीबियों में से हैं ये मुझे पता था। चलते समय उन्होने मुझसे कहा कि अगली बार आना तो हमारे मेहमान बनना...मैने कहा- देखते हैं, कोशिश करूंगा
खैर सब कर कराकर मैं बाहर निकला - देखा चिट्ठी का लिफाफा बंद नहीं था
सबसे पहले चिट्ठी देखी, उसमें लिखा था -

प्रिय रजत जी,
काफी कोशिशों के बाद भी आप मुझे अबतक पकड़ नहीं पाए
लेकिन आपके रिपोर्टर रजनीकांत ने मुझे पकड़ लिया। छोटी सी उम्र में
जिस निर्भीकता और चतुराई से ये काम करते हैं उसने मुझे प्रभावित किया है।

भैरों सिंह शेखावत

उसके बाद मैं कई बार जयपुर गया लेकिन दोबारा मिला नहीं, 5-6 महीने बाद अचानक एक दिन दिल्ली में राजस्थान हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर का फोन आया कि- शेखावत जी की ओर से फेरी क्वीन में जाने का निमंत्रण है ...शनिवार को जाना है। पता नहीं उन दिनों खून में कितनी गरमी थी कहा भैरों सिंह जी को मेरी ओर से धन्यवाद कहिएगा लेकिन माफ कीजिएगा मैं सरकारी खर्चे पर यात्राएं और मौज मस्ती करने वाले पत्रकारों में नहीं हूं, मेरा मन नहीं करता...मुझे माफ करें
इस तरह शेखावत जी से दोबारा मिला तो नहीं लेकिन वो पहली और आखिरी मुलाकात आज भी ऐसा लगता है कि जैसे कल की ही बात हो ।
ईश्वर उस सरल, बेबाक और जिंदादिल इंसान की आत्मा को शांति दे।

- रजनीकांत मिश्र
15-05-2010