बुधवार, 12 अक्टूबर 2022

यादें मुलायम पार्ट 2

 मुलायम सिंह यादव से जुड़ा दूसरा संस्करण उस ज़माने का है जब वो देश के रक्षा मंत्री हुआ करते थे, हमारे तत्कालीन संपादक रजत शर्मा जी ने किसी रक्षा सौदे से जुड़ा कोई सवाल उनसे पूछने का मुझे सीधे निर्देश दिया था.. तब मोबाइल फ़ोन जैसी कोई सुविधा थी नहीं तो सीधे कैमरा यूनिट उठायी और सीधे पहुँच गया समाजवादी पार्टी के दफ़्तर …. वहाँ उस समय शायद जगजीवन नाम था उनका वही उनके खास थे जो प्रेस से डील करते थे तो मैंने जगजीवन से कहा कि एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर एक छोटा सा इंटरव्यू करना है उस समय इतने न्यूज़ चैनल भी नहीं थे तो कहने पर इंटरव्यू मिल भी जाता था लेकिन मैं तब चौका जब जगजीवन ने बताया कि नेताजी बहुत बिज़ी हैं और इंटरव्यू के लिए उपलब्ध नहीं हैं, मुझे तब तक इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि मुलायम सिंह इस सवाल को टाल रहे हैं तो मैंने जगजीवन को धमकाया, देखो भाई आज इंटरव्यू नहीं मिला तो आगे से किसी प्रेस कांफ्रेंस की भी रिपोर्टिंग नहीं होगी, ANI को मना कर दूंगा और मैं आकर भी रिकॉर्ड नहीं करूंगा… 



तभी मुलायम सिंह पार्टी दफ्तर से निकलने लगे, जगजीवन ने आगे बढकर उनके कान में कुछ फूंका और उन्होंने इशारे से हमें साथ आने को कहा, हम एस्कॉर्ट के पीछे पीछे गाडी लगाए चलते रहे, काफिला अमौसी हवाई अड्डे पर जाकर रुका, हमें तब तक पता नहीं हम जा कहां रहे, मैने दौडकर मुलायम सिंह जी को पकड़ा- 2 मिनट लगेगा यहीं कर लेते हैं दो सवाल पूछने हैं बस…

मुलायम सिंह जी ने मुझसे कहा- साथ चलो प्लेन पर इंटरव्यू दूंगा, 

जाना कहां है ? मैने पूछा 

इलाहाबाद एक कार्यक्रम है लेट हो रहा है.., 


मरता क्या ना करता चढ गया, एयरफोर्स का VIP  रक्षा मंत्री का प्लेन था फिर भी जैसे ही उड़ा लगा दिमाग़ की सारी नसें फट गई मुझे तो प्लेन में मौजूद एयरफोर्स के कर्मचारियों ने कुछ चिंग्वम और चिकलेट्स खाने को दी, तब कुछ राहत मिली, खैर लौटते वक्त मुसायम सिंह जी ने विमान में ही इंटरव्यू दिया, वापस लोटते ३ बज रहे थे, लखनऊ एयरपोर्ट पर सहारा का विमान दिल्ली उड़ान भरने को तैयार खड़ा दिखाई दिया, मैने निराश होकर मुलायम सिंह से कहा सारी मेहनत बेकार चेप तो दिल्ली जा नहीं पाएगा…तुरंत आसमान से ही संपर्क साध कर टेप विमान में पहुंचाने की व्यवस्था हुई, इस तरह मेरा ये मुलायम सिंह जी का सबसे सख़्त इंटरव्यू रहा।

यादें मुलायम - पार्ट 1

 मुलायम सिंह यादव नहीं रहे …, 


अपने पत्रकारिता जीवन के दौरान मेरे भी उनसे जुड़े कुछ छोटे मोटे संस्मरण रहे आज सोचा कि उनको 1 जगह संकलित कर दूं जिससे याद में बने रहें।

पार्ट १-

1996-97 की बात होगी ज़ी न्यूज़ का लखनऊ में नया नया ब्यूरो खुला था मेरा घर लखनऊ होने की वजह से मैं भी दिल्ली छोड़कर लखनऊ आ गया था यहाँ आया तो दिल्ली और लखनऊ में बड़ा अंतर देखने को मिला


ख़ैर धीरे धीरे यहाँ के रंग ढंग में ढलना शुरू किया, तब नेताओं के पीछे माइक लेकर दौड़ने वाली परंपरा नहीं थी सलीक़े से नेता प्रेस कॉन्फ़्रेन्स बुलाते थे और अपनी बात कहते थे उसके बाद पत्रकारों को जो पूछना होता था पूछ लेते थे लेकिन यहाँ समस्याएं होती थी कि हम जैसे ही सवाल पूछते थे नेताओं को तो चुभते ही थे हमारे साथियों को भी बहुत चुभते थे कई बार मैंने सुना है आज कल के  नए नए लड़के पत्रकारिता में आ रहे हैं और यह भी नहीं सोचते हैं की बुजुर्ग नेता जी को मुलायम सिंह जी नहीं बोलना चाहिए लेकिन भाई मेरा मानना था छोटे हो या बड़े हम कोई क़ैडर तो है नहीं जो नेताजी बोलें, अब भले इन सबका महत्व ना हो लेकिन तब हुआ करता था, कोई बड़ा सवाल पूछे तो उसमें भी अगर नेताजी फँसने लगे तो तुरंत उसको काटकर दूसरा सवाल पूछ देना ये कलाकारी भी होती थी . हम TV वालों ने इसका एक जुगाड़ निकाल लिया आमों पर फ़र्स्ट फ़्लोर में होने वाली प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में जाते ही नहीं थे बस वहाँ कैमरामैन जाता था 1 दो मिनट के लिए और कटवा इस बनाके निकल ले भागा हम नीचे पूरा सेटअप लगवा लेते थे पार्क में और वहीं पर सवालों जवाबों का सिलसिला शुरू होता था।

तीखे सवाल पूछना हमारे शौक से ज़्यादा हमारी मजबूरी थी हमें अपनी स्टोरी के हिसाब से बाइक चाहिए होती थी शायद ये बात प्रिंट के साथियों को हज़म नहीं होती थी।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

नेता जी का हिंंदी दिवस...!!

नेता जी को आज हिंदी दिवस पर भाषण देने जाना है, 
सुबह से ही नेता जी के अंदर अजब से हिंदी प्रेम के भाव जग रहे हैं
जैसे जगते हैं साल के दो दिन देशभक्ति के भाव। 
नेता जी अपने अंदर हिंदी की दशा और दुर्दशा पर भाव उमेड़ने की कोशिश कर रहे हैं
याद करने की कोशिश कर रहे हैं शायद जीवन में हिंदी के लिए कुछ किया हो
तभी सुबह सुबह नेता जी का अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहा बेटा सोते से उठकर आया
पूछा - बाबू, आज स्कूल में छुट्टी है, मुझे चिड़ियाघर ले चलेंगे?
नेता जी को बेटे के मुंह से निकले शब्द ना जाने क्यों तीर से लगे।
नेता जी, बोले - ओ माई डियर सन...बाबू नहीं मुझे डैड बोल, 
कितनी बार बताऊं तू हर बार भूल जाता है, क्या इसी लिए नोटों की गड्डियां खर्च कर अंग्रेजी स्कूल में पढाता हूं। 
और चिड़ियाघर क्या जाएगा वहां तो अनपढ़ लोग जाते हैं , मैं तुम्हें ज़ू ले जाउंगा, 
लेकिन एक बार ये बात तू अंग्रेजी में तो कहकर दिखा 
बेटा बोला- बाबू क्या फरक पड़ता है, हिंदी अंग्रेजी में क्या है रखा? 
मेरी किताब में तो लिखा है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है, फिर इसे बोलने में शर्म क्यों करना?
नेता जी बोले- बेटा हम नेता हैं, हमारे दो चेहरे होते हैं 
दो आंखें दो आंख तो सबके पास होते हैं, लेकिन हमारे पास एक असली और एक दिखाने वाले दो चेहरे होते हैं, 
चेहरे ही नहीं दो चरित्र भी होते हैं, एक असली और एक दिखाने का, 
इसलिए बेटा किताबों में लिखी बातोें पर मत जाओ
हिंदी पढ़ोगे, हिंदी बोलोगे तो बन जाओगे किसी सरकारी स्कूल के मास्टर, 
लेकिन अंग्रेजी की पढ़ाई तुम्हें बनाएगी लाट साहेब, 
इसलिए हिंदी को तू मातृभाषा भले मान लेकिन सोच ले बाप तेरी अंग्रेजी ही है। 
सोचता है कवि रजनी नेता क्या गलत कह रहा है....
आजाद हुए हमें भले 72 साल हो गए हों, लेकिन हिंदी है तो आज भी अंग्रेजी की गुलाम ही। 
इसलिए अगर सचमुच हिंदी को उसका स्थान दिलाना है तो सिर्फ एक दिन नहीं हर दिन को हिंदी दिवस की तरह ही मनाना है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

सौराष्ट्र में 12 लोगों का ओपिनियन पोल

                          गुजरात चुनाव को लेकर राजनीति गरमाई हुई है, हिंदू, मुस्लिम और मंदिर मस्जिद का मसाला खूब उड़ेला जा रहा है लेकिन क्या ये मुद्दे जनता जनार्दन की जीभ से होकर दिमाग तक पहुंचेंगे...
ये तो 18 दिसंबर के नतीजे ही बताएंगे लेकिन इन मुद्दों से पहले जनता की क्या राय थी ये जाना मैंने दक्षिणी गुजरात यानी सौराष्ट्र की यात्रा में – हालांकि यात्रा निजी थी और मकसद शुद्ध धार्मिक ...लेकिन हम कलम घिसने वालों को वहां भी चैन कहां...सो द्वारका, बेट द्वारका से लेकर सोमनाथ तक की यात्रा के दौरान मैं डरते डराते लोगों को ओपिनियन पोल करता रहा...10-12 लोगों का ओपिनियन पोल ऐसा था जिसकी मुझे कल्पना नहीं थी...मुझे कश्मीर भारत विरोधी माहौल में काम करने का 5-7 साल का अनुभव था इसलिए मेरे सवाल होते थे – क्या लगता है भावेश भाई, इस बार मोदी जी की हर बार की तरह बंपर जीत होगी गुजरात में ? मतलब सितंबर के महीने में मेरी ये पूछने की हिम्मत नहीं थी कि इसबार बीजेपी गुजरात में जीतेगी या हारेगी...खैर मेरे सवालों के मुझे जो जवाब मिल रहे थे वो बिल्कुल चौकाने वाले थे...कोई कह रहा था कि नहीं पहले जैसी जीत नहीं हो सकती, कोई कह रहा था यहां बीजेपी के सिवा कोई विकल्प ही नहीं तो कई ऐसे भी थे जो अपना अकेला वोट किसी और को डाल कर बीजेपी को हराने का दम भर रहा था..उनकी नाराजगी की वजह भी जीएसटी और आधार कार्ड के बिना बैंक खातों से पैसे ना निकालने देने के नियम थे, द्वारका में मैं जिस होटल में रुका था उसका मालिक जीएसटी से परेशान था, बताइये द्वारका जैसा छोटा सा कस्बा...यहां सिर्फ श्रद्दालु ही आते हैं जो एक दिन यहां रुक कर लौट जाते हैं, पहले ही ग्राहकों का टोटा रहता था अब जीएसटी ने रेट और बढ़ा दिए तो लोग क्यों होटल में ठहरेंगे । यानी अभी तक सब बिना टैक्स के ही चल रहा था....द्वारका होटल के सामने ही पहली मंजिल पर एक अच्छा रेस्टोरेंट था...अच्छा रेस्टोरेंट इसलिए कि वहां खाना तो अच्छा मिल ही जाता है पेमेंट भी डिजिटल हो जाता है, लेकिन यहां घुसते ही मैंने रिसेप्शन पर पूछा-
पेमेंट कार्ड चल जाएगा,
वो बोला ना भाई ओन्ली कैश ...
.कैश तो है नहीं मेरे पास
आप ऑर्डर कर दो ...मंदिर कंपाउंड में ही HDFC का एटीएम है ..अधर बाजू मार्केट में SBI एटीएम है आप निकाल लो  
यानी यहां भी खाता ना बही....बाकी सब सही
द्रारका से बेट द्वारका जाने के लिए टैक्सी ली. रास्ते में ड्राइवर से बतकही शुरू की...
वो तो लगता था भरा ही पड़ा था....जीएसटी, नोटबंदी, आधार सब गिना डाले भाई ने
जहां जहां मैं डरते डरते सवाल पूछता था...वहीं थोड़ी देर में बीजेपी के बचाव की मुद्रा में आ जाता था
अरे इससे टैक्स आएगा, अरे इससे काला धन रुकेगा... जैसी मेरी दलीलें कोई मानने को तैयार नहीं था. बेट द्वारका के लिए फेरी पर सवार हुआ, बेट द्वारका के रहने वाले एक बुजुर्ग दंपत्ति मेरे साथ ही बैठे थे...मैने धीरे से उनसे बातचीत शुरू हुई पता चला दोनों ओखा गए थे, आधार कार्ड जुड़वाने ...मेहनल मजदूरी करने वाले बुड्ढे, बुढिया दोनों के अंगुलियों के निशान मशीन पकड़ ही नहीं पा रही है, दोनों गहरे सदमे में हैं, हाथ की लकीरों को उन्होंने इससे पहले कभी इतना नहीं कोसा होगा जितना आज कोस रहे हैं..वो भी तब जब लकीरें मिट गई हैं... मायूस बुढिया मेरी तरफ देखकर बोली- मतलब मेरा पैसा डूब गया....मैंने उसे समझाया नहीं नहीं – पैसा कहीं नहीं जाएगा...उंगलियों के निशान नहीं मिले तो कोई बात नहीं...आंखों की पहचान से हो जाएगा...ये भी नहीं हुआ तो भी कुछ नहीं होगा पैसा कहीं नहीं जाएगा....बुड्ढे ने बड़बड़ाकर बुढिया को गुजराती में ही कुछ कहा...फिर दोनों चुप हो गए...बुड्ढा गुजराती में ही किसी और से बात करने लगा....मैंने धीरे से बुढिया से पूछा कि क्या बोला अभी बुड्ढा ....वो धीरे से बोली- कह रहा है कि ये भी दिल्ली वाला है इसकी बातों में मत पड़...ये भी बातें ही फेंक रहा है” ….मुझे बुड्ढे पर बहुत गुस्सा आया मैं तो उसे समझा रहा हूं वो मुझे दिल्ली से आया फेंकू बता रहा है...बहरहाल नाव आधे घंटे में बेट द्वारका पहुंच गई...दर्शन किए
द्वारका फिर लौट आया .
दूसरा दिन –
दूसरे दिन मुझे सोमनाथ जाना था सुबह सुबह 6 बजे उठा होटल वाले ने कहा चाय 7 बजे के बाद ही मिलेगी, अभी जरूरी हो तो गोमती होटल के सामने चायवाला है वहां से ले लें....होटल के बाहर चायवाला बड़े आराम से चाय बेच रहा था...ये अचंभा भी द्वारकाधीश की नगरी में ही संभव है...बाकी देश की नगरी में कहीं संभव नहीं था, फीकी चाय बोली, सिगरेट मुंह में दबाई...बोला चाचा पेटीएम कर दूं.....चायवाला बोला समझ में नहीं आया..चाय में कुछ और डालना है क्या..इलायची तो डाला है
मैंने उसे हाथ से इशारा किया नहीं कुछ नहीं वो टूटे पैसे नहीं हैं – 500 का नोट है 10 रुपये की चाय के लिए 500 का नोट ठीक नहीं लगता ना....अब तक मेरा हौसला बढ़ चुका था... मैंने कोसना शुरू किया मोदी जी ने तो ऐसा बरबाद कर दिया है कि एटीएम से निकालो तो 100 रुपया निकलता ही नहीं सीधे 500 का निकलता है अब क्या करूं इसको चांटूं ...?
लेकिन हाय रे मेरा दुर्भाग्य यहां भी मेरा दांव उल्टा पड़ गया, चाय वाला बोला 500 का हो या 2000 का मुझे दो मैं चेंज दूंगा- मोदी जी को क्यों कोस रहा...वो आदमी बहुत अच्छा है देश का भला कर रहा है...कुछ लोग देश में अच्छे लोगों को काम करने नहीं देना चाहते और ऐसे ही लोग विरोध कर रहे हैं....मैंने तमाम दलीलें रखी जीएसटी, आधार, नोटबंदी...उसने सब काट दीं...मैंने अंत में पूछा – चाचा, चायवाले के नाते उसका पक्ष तो नहीं ले रहे ना...वो बोला मुझे इससे मतलब नहीं कि वो चायवाला है या देश का पीएम...सही बात को सही ही कहूंगा....मैंने पूछा तो चाचा टैक्स देते हो...मोदी जी कहते हैं कि सबको टैक्स देना चाहिए...अब वो पीछे हट गया...मैं यहां लोगों को चाय पिलाता हूं

किसी तरह रोटी का जुगाड़ करता हूं ...मैं क्या टैक्स दूंगा...मैं हाथ में चाय का कप लिए होटल की ओर चल दिया....                 

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..





इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..

जग में फैले अंधकार को आओ दूर भगाएं

मारकाट के तम से देखो स्याह पड़ा है नभ मंडल

दीप एक जलाकर आओ इस नफरत को आज मिटा दें

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..


हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई के नामों पर फैला बहुत है अंधियारा

भाईचारे का एक दीप जलाकर इस तम को भी मार भगाएं

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..


भ्रष्टाचार और लालच का दानव भी खूब फलफूल रहा

अहंकार का रावण भी तो महीने भर पहले ही फूंका था

एक बार फिर बढ़कर उसने आसमान का चूमा है

एक दीप इस अहंकार के नाम भी आज हमें जलाना है

अहंकार के रावण को इस दीवली मार गिराना है

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..



कोई रटता मंदिर-मंदिर, कोई काबा काबा

फिर भी इनके मन में बैठा अंधकार ना भागा

आओ हम सब एक दीप अपने मन मंदिर में भी जलाएं

मन में बैठे महातिमिर को खुद से दूर भगाएं

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..



अपने घर में घी के दीयों से उतनी खुशियां ना मिल पाएंगी

किसी गरीब के घर एक दीप जलाने से जितनी हम तक आएंगी



इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..

बुधवार, 3 अगस्त 2016

ऐ शहर कोई ना कहेगा अब तुझे 'बुलंद'शहर

ऐ शहर कोई ना कहेगा अब तुझे  'बुलंद'शहर
हम तो कहेंगे तुझे आदम शहर
लेकिन नहीं, आदम कितने भी अनपढ़ जाहिल रहे हों,
लेकिन इतने पाशविक तो कभी नहीं रहे होंगे;
किसी मां को, किसी १३ साल की बेटी को नहीं बनाया होगा
 उन्होने कभी शिकार
उस आदिम युग के किसी बाप को नहीं सुननी पड़ी होगी
दरिंदों का शिकार हो रही बेटी का चीत्कार,
और उस युग में किसी मां ने भी नहीं देखा होगा
अपने कलेजे का ऐसा बलात्कार
क्यों नहीं देखा होगा, मैं आपसे पूछ रहा हूं क्यों नहीं देखा होगा ?
क्योंकि वो बुलंद'शहर में नहीं जंगलों में रहते थे,
मैं कहता हूं मिटा दो ये शहर, मिटा दो ये कस्बे
आओ फिर जंगलों में लौट चलें
लेकिन उससे पहले उन सभी दरिंदों को मेरे हवाले कर दो,
उन्हें इस देश का कानून सजा नहीं दे पाएगा,
हम उन्हें जंगल में ले जाएंगे,
उन्हीं जंगलों में जहां उन्होने उस हैवानियत को अंजाम दिया था,
मैं उसी जगह ले जाकर उनका इंसाफ करूंगा, मौत नहीं दूंगा,
वो सजा दूंगा कि सुनकर जिसे याद कर पापियों के हाथ थर्राने लगें,
मुझे जंगलों में लौटना है,
जल्दी करो इस शहर में मेरा दम घुट रहा है
मुझे जंगलों में लौटना है,
जल्दी उन पापियों को मेरे हवाले कर दो।
मुझे जंगलों में लौटना है ।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं ...


लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं ...

लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं
पिछले दो एक हफ्तों से मुझे लगने लगा है
कि हवाएं अचानक अपना रुख बदलने लगी हैं
सूरज की तपन अचानक फिर बढ़ने लगी है
हर दिशाओं में शोर बढने लगा है
आसमान के नीलेपन में भी लाली छाने लगी है

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..


सड़क किनारे नागफनियों में कांटे बढ़ने लगे हैं
नन्हें पेड़ पौधे भी कुम्हलाने लगे हैं
बड़े दरख्तों की कोमल फुनगियां भी मुरझाने लगी हैं
फूलों के रंग उड़ने लगे हैं, कलियां खिलने से खौफ खाने लगी हैं

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..

नुक्कड़ों पर नजर आने वाले बुजुर्गों के गुट भी छितराने लगे हैं
अब शर्मा जी और खान साहब दूर-दूर नजर आते हैं
पड़ोस वाले नकवी साहब, पंडित जी से नजरें चुराते हैं

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..

अचानक जान पहचान वाले मुझे बताने लगे हैं कि ये हिंदू है
और वो मुसलमां है

अचानक मोहल्ले के मंदिर और मस्जिदों पर टंगने लगे हैं भोंपू

आयतों और आरतियों से मोहल्ला गूंजने लगा है



अचानक काले कारनामे करने वाले शोहदे ने पहनने शुरू कर दिए हैं झक्क सफेद कपड़े

अब वो मुझे देखकर पहले की तरह आंखे भी नहीं तरेरता,
झूठी मुस्कान के साथ बस हाथ जोड़ लेता है ...
पहले मुझे उससे डर नहीं लगता था लेकिन अब बहुत डर लगता है

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..


अचानक हर शहर में गायों भरे ट्रक पकड़े जाने लगे हैं
पता नहीं ट्रक वाले ही गायों को पकड़वा रहे हैं
या पकड़ने वाले ही ट्रकों को भर-भरकर ला रहे हैं
ना जाने वो कौन हैं जो बेगुनाह बेजुबानों को कटवा रहे हैं

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..


अचानक चीजों के दाम दोगुने हो गए हैं
दाल, चावल, आटा आसमां में उड़ रहे हैं
आलू, टमाटर, टिंडे जमीन पर अपने अपने रंग दिखा रहे हैं
दुकान का सेठ अपने मुनीम को समझा रहा है
10 पेटी इलेक्शन खर्चे के लिए भी निकालना है

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..




रविवार, 9 अगस्त 2015

बीजेपी के भाग से बिहार का छींका टूटेगा ?


गया के गांधी मैदान से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के लोगों को विकास के खूब सपने दिखाए. सपने भी दिखाए और बिहार की नीतीश सरकार को जमकर कोसा भी...मोदी ने कहा 25 साल से इन्हीं लोगों ने बिहार पर राज किया है और नतीजा ये कि बिहार दिन पर दिन पिछड़ता चला गया । हालांकि भाषण देते वक्त पीएम मोदी ने इस बात को जानबूझकर भुला दिया कि बिहार में नीतीश कुमार के साथ कंधा मिलाकर बीजेपी ने भी करीब 8 साल गठबंधन की सरकार चलाई है। मोदी ने कहा कि बिहार अभी भी बीमारू राज्य है और राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह अगर बिहार को भी इस सूची से बाहर लाना है तो यहां भी बीजेपी की सरकार बनवानी होगी। मोदी के दावे पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने पलटवार किया है, दावे को गलत बताते हुए उन्होंने कहा है कि बिहार अब बीमारू राज्य नहीं है, नीतीश ने पूछा कि क्या केंद्र केवल उन्हीं राज्यों को मदद करेगा जहां उनकी पार्टी की सरकार है ।
पीएम मोदी ने कहा दिल्ली से विकास की गंगा लगातार बिहार की तरफ बह रही है लेकिन नीतीश सरकार तो उल्टा लोटा लिए खड़ी है जो इससे कुछ हासिल ही नहीं कर रही है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालू यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार में जंगलराज- 2 शुरू हो रहा है और जेल से बुरी बुरी चीजें सीख कर लौटे लोगों के जरिए जहर फैलाया जा रहा है । मोदी के जेल वाले इस बयान पर लालू यादव और नीतीश कुमार ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को लपेट लिया , लालू ने पूछा है कि अमित शाह जेल से क्या सीख कर लौटे थे एक बार उन्हीं से पूछ लें । बीजेपी की आंखों की किरकिरी बन चुके नीतीश और लालू के गठबंधन पर भी पीएम ने निशाना साधा, पीएम ने पूछा जिन लोगों ने अभी जहर पिया है वो बाद में किसपर निकालेंगे । दरअसल बिहार में नीतीश से गठबंधन के बाद लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि उन्होने जहर पिया है, नीतीश के चंदन और भुजंग वाले बयान को लेकर भी मोदी ने तंज कसते हुए पूछा कि कौन चंदन कुमार है और कौन भुजंग प्रसाद मुझे तो पता ही नहीं। दरअसल बिहार में नीतीश और लालू की दोस्ती बीजेपी के लिए एक नई मुसीबत बन कर खड़ी हो गई है, उसका बिहार में जीत का सपना धुंधलाने सा लगा है लेकिन बीजेपी को अभी भी उम्मीद है कि किसी तरह बिल्ली के भाग से गठबंधन का छींका टूट जाए जिससे बिहार की मलाई एक बार उसे अकेले चट करने का मौका मिल सके, हालांकि लालू और नीतीश की जोड़ी उन्हें ये मौका देगी इसमें थोड़ा संदेह है।

सोमवार, 3 अगस्त 2015

फर्स्ट डिवीजन की मौत !

IIT रुडकी के छात्र महीने भर के ड्रामे के बाद आखिर वापस ले लिए गए....भले हालात कुछ दूसरे हों लेकिन जिस दिन से ये मामला सामने आया था उसी दिन से मुझे अपने वो दोस्त याद आने लगे जो करीब ३० साल पहले अचानक गुमनामी में खो गए, आज तक ना उनका कोई फोन आया ना किसी से उनके बारे में सुनने को मिला, क्या किया होगा, क्या उन्होने नदी में कूद कर जान दे दी होगी या किसी ट्रेन के नीचे लेट गए होंगे। अगर ऐसा हुआ होगा तो सिर्फ उस शख्स के पीछे जिसे छात्रों के भविष्य ये ज्यादा अपने स्कूल की झूठी इज्जत की चिंता थी। कहानी लखनऊ के एक नामी स्कूल से जुड़ी है नाम बताना उतना जरूरी इसलिए भी नहीं क्योंकि जिन तक ये बात पहुंचानी है उनको इसमें अपनी आत्मा जरूर दिख जाएगी, हां तो १९८५ के आसपास की बात होगी, नौवीं पास कर हम दसवीं में गए थे, हमें सुबह ८ बजे से शाम ६ बजे तक स्कूल नें ही पढना होता था, पढने के बजाय घोटा लगाना कहें तो ज्यादा सही होगा, क्योंकि हाईस्कूल की पढाई के लिए कितनी देर पढने की जरूरत होती है.......लेकिन हमारे स्कूल में तो कुछ बच्चों को तस्कूल में ही बिस्तर तक लगवा दिए गए, और जो बच्चे इसके बाद भी तोतों को रटाने वाले रिंग मास्टरों को कम से कम फर्स्ट डिवीजन लाने का भरोसा नहीं दिला पाए उन्हें स्कूल छोडने का आदेश सुना दिया गया, इनमें से कई केजी नर्सरी से इसी स्कूल में पढ रहे थे, बहुत रौए गिडगिडाए, उन्ही मां बापों ने आकर उनके पांव भी पकडे जिन्हे तराजू में फल फूल से तौलने का स्कूलवाले ढकोसलेबाज नाटक रचते थे, लेकिन विश्व शांति का लबादा ओढकर घूम रहे मार्केटियरों को जरा भी दया ना आई, २५-३० बच्चों को एक झटके में निकाल दिया गया, आखिर क्यों किस बात का गुरूर था उन्हें, छटनी पहले पांचवीं में, फिर आठवीं में, फिर नवीं में ......फिर भी दिन रात रटाने वाले बच्चों को भी अपनी उम्मीदों पर ढाल नहीं सके तो ये बच्चों की नहीं रिंगमास्टरों की गलती है, जिस लडके ने हाईस्कूल में पूरे यूपी में टॉप किया वो अगले साल फर्स्ट डिवीजन भी नहीं ला सका, गलती उस लडके में नहीं स्कूल के सिस्टम में थी, इधर बीच सेशन में निकाले गए लडकों को कहीं दाखिला मिल नही सकता था, सो लोग मारे मारे घूमते रहे साल बरबाद हुआ होगा, कुछ इस जिल्लत में आत्मा से मर गए होंगे, कुछ नफरत की आग में जल गए होंगे, ३० साल बाद नाम तो किसी के याद नहीं लेकिन उनके वो दर्द भरे चेहरे आज भी याद हैं, इव सब के कत्ल का जिम्मेदार जो भी हो उसे ईंट पत्थर की अदालतों में शायद सजा ना दी जा सके लेकिन कुदरत उनका इंसाफ जरूर करे, जिन मां बापों की आंखों के सपने छिने उनके गुनहगारों को कुदरत वैसी ही सजा दे। स्कूल के मेरे कुछ दोस्तों कुछ अध्यापकों को शायद मेरी बातें अच्छी ना लगें उनसे मैं माफी चाहता हूं लेकिन क्या करूं फर्स्ट डिवीजन का शोकेस लगाकर अपनी दुकान चमकाने और बचपन की हत्या करने वालों का असली चेहरा भी तो सामने लाना जरूरी है। स्कूल के २०० बच्चों में से छाटकर १०० बच्चों को अव्वल दिखाना कोई बड़ा काम नहीं है, हम तो तुम्हें तब गुरु मानेंगे जब सारे २०० बच्चों को तुम अव्वल वाले मुकाम पर पहुंचा दोगे।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

जब राजेंद्र यादव को कसाई बना दिया था मैंने…. !

दिल्ली- नोएडा के बीच आपको सुबह-शाम यात्रा करनी हो तो किसी सरदर्द से कम नहीं, भयंकर जाम हर सड़क पर मिल जाएगा, किसी तरह मोटरसाइकिल से दफ्तर पहुंचा तो साढे नौ बज रहे थे, अपनी सीट पर पहुंचा..टीवी बंद पड़ा था, ऑन किया 9.30 की हेडलाइन चल रही थी, आखिरी हेडलाइन आते आते टीवी ऑन हुआ तो सामने देखा राजेंद्र यादव जी के ना रहने की दुखद खबर थी...अरे मुझे सुबह से तो पता ही नहीं चला.. ओह याद आया आज सुबह से घर पर लाइट नहीं थी, इन्वर्टर 42 इंच के टीवी का लोड लेते ही ट्रिप होने लगता है इसलिए चाहकर भी टीवी नहीं खोला था....मैंने अपने सहकर्मी से तस्दीक की- ...अरे राजेंद्र यादव जी नहीं रहे ....यकीन नहीं हो रहा मुझे आज दिन भर वो दिन याद आता रहा ...जब मैं राजेंद्र यादव जी से पहली बार मिला था, और पहली बार में ही अपने अंदर उनकी जो छवि मैंने बना रखी थी, उनके सामने उसे पेश कर दी, वो भी एक कार्टून के रूप में, उस कार्टून में उनपर जबरदस्त कटाक्ष था, फिर भी उन्होंने बड़े ही प्यार से उसपर दस्तखत किए और मुझे प्यार से लौटाया ये कहकर कि इसकी एक फोटो कॉपी उन्हें भी दे दूं । आज मैं अपने पुराने कागजों में वो कार्टून ढूंढ रहा था लेकिन अभी तक मुझे मिला नहीं। बात उन दिनों की है जब मैं आईआईटी कानपुर में टेलिविजन सेंटर में ट्रेनिंग कर रहा था, साहित्य की रुचि मुझे शुरू से ही थी आईआईटी में तो माहौल ही अलग था, साहित्य तो दूर की चीज थी राजनीति की चर्चा भी कम ही सुनाई पड़ती थी, एक लेक्चर हॉल से दूसरे हॉल के बीच साइकिल पर घूमते प्रोफेसर और छात्र एल्फा, बीटा, गामा की लेन में ही रोबोट की तरह चलते नजर आते थे। लेकिन एक प्रकृति के लोग जब एक जगह होते हैं तो मिल ही जाते हैं ऐसा ही हुआ, उन दिनों में आईआईटी में साहित्यकार गिरिराज किशोर जी भी थे, वो क्रिएटिव राइटिंग विंग के सर्वे सर्वा थे, उन्होने एक हिंदी कविता कार्यशाला का आयोजन किया था, रजिस्ट्रार दफ्तर के पास दीवार पर चिपके नोटिसों में से ये नोटिस चिपका देखकर मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि आईआईटी जैसे माहौल में भी कोई कविता, कहानी की बात कर सकता है, इसी कार्यशाला में से मुझे 2-4 दोस्त ऐसे मिले जो आईआईटी से एमटेक या पीएचडी कर रहे थे, उनमें मिलकर मुझे पता चला कि भले वो कंप्यूटर की मशीनी भाषाओं कोबोल, यूनिक्स के बीच रहते हों लेकिन उनके दिल में साहित्य जिंदा था। धीरे धीरे मैं भी 3-4 लोगों के साथ मिलकर मशीनी दुनिया के दोस्तों के साथ साहित्य की पौधों को रोपने लगा था। आईआईटी में हिंदी साहित्य का कारवां यहीं से शुरू हुआ- गिरिराज किशोर जी से मिलकर राजेंद्र यादव, नरेश सक्सेना जैसे तमाम साहित्यकारों को आईआईटी में बुलाया जाने लगा ताकि यहां के छात्र उनसे मिलजुलकर साहित्य के बारे में जान सकें। राजेंद्र यादव जी के आने की खबर हमें पहले से थी, मैं हंस का नियमित पाठक था, भले खरीद कर नहीं पढ़ता था, लेकिन हॉल -4 के रीडिंग रूम में रखी हर हंस का अंक मैंने पूरा पढ़ा था। उस दन गेस्ट हाउस में हम लोग शाम के वक्त राजेंद्र जी से मिलने पहुंचे, बातचीत शुरू हुई .... हम लोग अपनी जिज्ञासाएं उनके सामने रख रहे थे वो बड़े ही प्यार से हमारी बातों का जवाब दे रहे थे, मैं बातचीत नोट भी कर रहा था, लेकिन मेरे नोट पैड के बीच रखा कार्टून बार बार सामने आने को बेताब हो रहा था, मुझे डर भी था कि कार्टून देखते ही वो नाराज हो सकते हैं इसलिए पहले ही तय कर लिया था कि कार्टून कांड सबसे आखिर में ही किया जाए। हमने राजेंद्र जी को शॉपिंग सेंटर में बने एकमात्र रेस्टोरेंट में डिनर के लिए भी मना लिया था। डिनर के बाद हम गेस्ट हाउस फिर लौट आए, राजेंद्र जी ने अपना सिगार फिर सुलगा लिया था...अब वो बेड पर अधलेटे से थे और हम चारों लोग कुर्सियों पर बैठे थे ....जब मैं आश्वस्त हो गया कि राजेंद्र जी हम लोगों से काफी घुल मिल गए हैं तो मैंने बड़ी हिम्मत कर राजेंद्र जी से धीरे से कहा कि मैंने आपका एक कार्टून बनाया है आप देखना चाहेंगे...मैंने कार्टून निकालकर उनकी ओर बढ़ा दिया....पहले वो चौंके फिर देरतक देखने के बाद मुस्कुराए...और बोले...ओह तो आप मुझे इस नजर से देखते हैं...तुमने तो मुझे कसाई ही बना दिया और फिर जोर से हंसे...ओह तो आपने मुझे कसाई ही बना दिया... ! दरअसल हंस पढ़कर मुझे पता नहीं क्यों लगता था कि इसमें अश्लीलता का पुट जानबूझकर डाला जाता है, मुझे लगता था कि प्रेमचंद्र जी के हंस को राजेंद्र जी ने अश्लील बना दिया है, मैंने जो कार्टून बनाया था उसमें लकड़ी के एक गोल बेस पर एक हंस को दोनों पैरों पर खड़ा बनाया था....बगल में राजेंद्र यादव एक बड़ा चाकू लेकर खड़े हैं और हंस के दोनों पंख कटे नीचे पड़े हैं...हंस के दोनों स्तनों को देखकर राजेंद्र जी मुस्कुरा रहे हैं.. राजेंद्र जी ने उसके बाद हमें प्यार से समझाया कि साहित्य में वो सबकुछ होना जायज है जो हमारे समाज में है, जो हमारे समाज से घट रहा है अगर वो साहित्य में दर्ज हो रहा है तो इसमें हर्ज क्या है, आइने का और क्या काम होता है। राजेंद्र जी ने उस कार्टून पर दस्तखत किए और मुझसे कहा कि इसकी एक कॉपी उन्हें भी दे दूं...मैं दूसरे दिन एक डाक्यूमेंट्री शूटिंग के सिलसिले में बाहर चला गया और उन्हें कॉपी नहीं दे पाया, हालांकि बाद में मैंने उन्हे कोरियर से कॉपी भिजवाई पता नहीं उन्हें मिली थी या नहीं ....!

शनिवार, 3 जुलाई 2010


कीशू भाया, कीशू भाया
बिस्किट खाया
दूध पिलाया;
फिर क्यों शोर मचाया ?
कीशू भाया, कीशू भाया
फिर क्यों शोर मचाया
तुमको मैंने खूब घुमाया
लोरी गाकर तुम्हें सुलाया
फिर क्यों शोर मचाया ?
कीशू भाया..कीशू भाया
फिर क्यों शोर मचाया ?
- गौरी
( ये कविता मैंने अपने भाई आदित्य के लिए

बड़े पापा के साथ मिलकर बनाई, और डैडी से लिखवाई)

सोमवार, 14 जून 2010

पहले व्यवस्था का प्रदूषण दूर करना होगा...!!


हिंदुस्तान की करोड़ों जनता की श्रद्धा जिस पतितपावनी गंगा मां पर है वो गंगा दिन पर दिन मैली क्यों होती जा रही है- समाजसेवी, सरकार और संत सब कितना भी रुदन कर लें गंगा नदी को गंदे नाले में बदलने में किसी के हाथ हिचक नहीं रहे । आखिर क्यों , गंगा क्यों साफ नहीं हो पा रही, कभी अमृत कहा जाने वाला गंगा का पानी आखिर क्यों जहर बन गया है। वजह बताने से पहले मैं आपको अपना छोटा सा अनुभव सुनाता हूं -

बात 1997 की है – मैं गंगा के बढते प्रदूषण पर एक स्टोरी करने कानपुर गया था – तमाम जगह घूम-घूमकर इसी हश्र पर पहुंचा कि हम तो गंगा की सफाई की बात करके सिर्फ पेड़ की जड़ धो रहे हैं , पेड़ की टहनियों और शिखाओं पर जमा प्रदूषण घुलघुलकर फिर जड़ों में पहुंच जाता है। सबसे पहले हम पहुंचे गंगा तट पर बनाए गए बिजली से चलने वाले शवदाह गृहों में। ये शवदाह गृह लाखों रुपये खर्च कर इसलिए बनाए गए थे कि लोग शव गंगा में ना बहाएं और प्रदूषण कम हो सके। लेकिन वहां पहुंचने पर पता चला कि रखरखाव की कमी के चलते ये शवदाह गृह पिछले दो बरसों से बंद पड़ा है। लाखों की कीमत से बना शवदाह गृह खुद अर्थी पर पड़ा था और घूसखोर लापरवाह अफसरों का इस पर एक बार भी ध्यान नहीं गया।

दूसरा वाकया एक लेदर टेनरी का था, वहां पहुंचकर जो देखा सुना लगा कि शायद ही गंगा कभी साफ हो पाए। कानपुर में टेनरी उद्योग से सबसे ज्यादा जहरीला तत्व गंगा में गिरता है, 200 से 300 के करीब इन टेनरी यूनिट्स में चमड़े को साफ किया जाता है, हर रोज सैकड़ों टन जहरीला कचरा गंगा में गिरता है, जाहिर है सरकार ने दिखाने को कुछ ना कुछ काम किए जरूर हैं मसलन अदालत के आदेश पर हर टेनरी में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं। फिर आखिर वजह क्या है कि ट्रीटमेंट प्लांट के बाद भी गंगा मैली हो रही है यही जिज्ञासा मेरे मन में भी थी। मैं टेनरी में घुसा तो लोगों में कोई खास प्रतिक्रिया नही हुई, कैमरा देखकर भी कोई नहीं घबराया। टेनरी का मालिक आया , बातचीत हुई वो हमें ट्रीटमेंट प्लांट पर ले गया। मैंने कहा ट्रीटमेंट प्लांट के बावजूद गंगा मैली क्यों हो रही है – वो बोला अब ये हम क्या बता सकते हैं।
मैने पूछा अभी क्या काम चल रहा है
हां..हां चल रहा है जी 24 घंटे काम चलता है
अच्छा ट्रीमटमेंट प्लांट से आवाज नहीं आ रही
...नहीं साहब ये नहीं चलता ...
क्यों..
अरे साब कोई फायदा हो तब
ना
क्यों
अरे पहले चलाता था ...तो इलाके का पॉल्यूशन इंस्पेक्टर आकर कहता था कि पैसे दो नहीं तो .यूनिट सील करवा दूंगा कि ट्रीटमेंट प्लांट नहीं चलता
मैंने समझाया कि साहब प्लांट तो पूरा टाइम चलता है
बोला – इससे मुझे मतलब नहीं मुझे तो पैसा चाहिए, किसने कहा ट्रीटमेंट प्लांट चलाओ ...बस मुझे ट्रीट करते रहो सब ठीक रहेगा
मुझे ट्रीट नहीं किया तो चाहे जितना प्लांट चलाओ लिख दूंगा प्लांट नहीं चलता और बंद करवा दूंगा पूरा कारखाना
फिर उसे 10 हजार रुपये दिए...जाते समय कंधे पर हाथ रखकर मुझसे बोला- मियां काहे बिजली बरबाद करते हो देश में वैसे भी बिजली की कमी है प्लांट चलाकर 15 हजार का बिल देते हो 10 हजार मुझे दे दो , पांच हजार की तब भी बचत है ना...हंसते हुए बोला – सरकार कहती है बिजली बचाओ...आप लोग समझते ही नहीं....अब बताइये गंगा मइया कैसे साफ रहेंगी जब ऐसे मलेच्छ अफसर भरे पड़े हैं – टेनरी मालिक झनझनाकर बोला

मेरे पास कोई उत्तर नहीं था...बड़े गुस्से में आकर रिपोर्ट बनाई ...टीवी पर प्रसारित हुई इलाके के 3 इंस्पेक्टर और अफसरों का तबादला कर दिया गया, नए अफसर आ गए लेकिन गंगा का प्रदूषण अब भी कम नहीं हुआ, मुझे फिर कानपुर जाकर टेनरी और ट्रीटमेंट प्लांट की पड़ताल का मौका नहीं मिला है लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि सिस्टम का प्रदूषण अभी भी कायम है , है कोई इसे खत्म करने वाला।

सोमवार, 7 जून 2010

मजबूरी में पत्रकार नहीं बना मैं....

मैं पत्रकारिता के पेशे में मजबूरी से नहीं आया था, ऐसा नहीं था कि पहले इंजीनियरिंग की कोचिंग की फिर आईएएस के लिए ट्राई किया और जब कहीं सफलता नहीं मिली तो मजबूरी में रोजी रोटी चलाने के लिए पत्रकार बन गया। आज पत्रकारिता में बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन मेरा मामला ही कुछ अलग था। बीएससी की पढाई करते-करते दर्जन भर अखबारों में लिखने के अलावा एक हिंदी अखबार में रिपोर्टिंग का काम भी मिल गया था। क़ॉलेज से छूटने के बाद जब साथी सिनेमाघरों का रउख करते तब मैं अखबार के दफ्तर में बैठकर खबरें लिखता और पहले शाम फिर देर रात तक घर लौटने लगा। मेरे पिता जी पेशे से पशु चिकित्सक हैं चाहते थे कि मैं डॉक्टर या इंजीनियर बनूं लेकिन मैने उन्हे मना कर दिया कि इनमें मेरी कोई खास रुचि नहीं है। पिताजी ने बीएससी खत्म होते ही एक महंगे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग कोर्स में दाखिला करवा दिया, अब इतनी फीस दी थी तो कोर्स पूरा किया और जितना खर्च हुआ था उतना कंप्यूटर से कमा कर दे दिया और कंप्यूटर को बाय बोल दिया - 0 से 9 के बीच मैं सारी जिंदगी काट नहीं सकता था ।

शनिवार, 15 मई 2010

मैं राजस्थान का शेखावत हूं......!!!

आज बीजेपी के एक युग का अंत हो गया, पूर्व उप राष्ट्रपति और राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके भैरों सिंह शेखावत का निधन हो गय़ा... आज पूरे दिन के बुलेटिन शेखावत जी को समर्पित रहे पूरे दिन बुलेटिन के दौरान मैं उन लम्हों को याद करता रहा जब मैं शेखावत जी से मिला था।
अपने पत्रकारिता के 15 साल के अनुभव में मेरा सामना कई खुर्राट नेताओं से हुआ शेखावत जी भी उनमें से एक रहे। बात 1996 की है उन दिनों मैंने जीटीवी में नौकरी करता था।
दिल्ली दफ्तर में नियुक्ति थी , लेकिन उन दिनों न्यूज चैनलों का नेटवर्क आजकल जैसा नहीं था इसलिए आसपास के राज्यों में भी मैं दिल्ली से ही स्टोरी कवर करने जाता था। राजस्थान मेरी पसंदीदा कर्मभूमि थी, वजह दिल्ली से नजदीकी दूसरे राजस्थान के शहरों की स्टोरी विजुअली बड़ी रिच होती थीं।
मैं दो चार स्टोरी आइडिया तलाशता और कूच कर जाता राजस्थान के शहरों की ओर, जन्माष्टमी का दिन था, मैं जयपुर पहुंचा पूरे दिन एक स्टोरी पर काम किया था - स्टोरी थी जयपुर शहर की एतिहासिक जेल को शिफ्ट करके वहां पर व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने की- मैंने एतिहासिक इमारत वाला एंगल निकाला और दिनभर विजुअल इतिहासकारों और कांग्रेस नेताओं के इंटरव्यू किए, लेकिन अभी तो स्टोरी अधूरी थी सरकार की ओर से भी तो कोई बोलने वाला चाहिए था, रात के 11 बजे थे क्या करूं....पता नहीं कैसे हिम्मत हो गई, 11 बजे रात राज्य के मुख्यमंत्री भेरों सिंह शेखावत जी के घर के टेलीफोन की घंटी बजा दी। उधर से रौबीली आवाज में हैलो हुआ - मैंने कहा मैं जीटीवी से हूं शेखावत जी से बात करना चाहता हूं, अगर तकलीफ ना हो तो बात करा दें, उधर से आवाज आई बताइये बोल रहा हूं.....मैने कहा - मजाक मत कीजिए भैरों सिंह शेखावत जी से बात करा दीजिए, शेखावत जी बोले नहीं मजाक नहीं मैं भैरों सिंह शेखावत ही हूं, बताइये क्या काम है - मुझे विश्वास तो जरा भी नहीं था कि फोन पर दूसरी ओर शेखावत जी हैं लेकिन मैने बोलना शुरू कर दिया - मैंने कहा कि मैं दिल्ली से आया हूं, यहां की ऐतिहासिक इमारतों पर कुछ स्टोरी कर रहा हूं आपका इंटरव्यू चाहिए...
उधर से आवाज आई - नहीं भाई मैं रजत जी के लिए इंटरव्यू नहीं दे सकता
मैं चौंक गया - रजत जी को कोई मना कैसे कर सकता है
मैंने कहा- ऐसा क्यों
शेखावत जी बोले - रजत जी अपने प्रोग्राम में कहेंगे भैंरो सिंह शेखावत हाजिर हों एक मुजरिम की तरह बुलाएंगे मुझे ये मंजूर नहीं ... वो कई बार मुझे अपने प्रोग्राम के लिए बुला चुके हैं लेकिन मैं इसीलिए नहीं आता हूं
मैंने बड़ी विनम्रता से कहा - नहीं शेखावत जी, यहां कोई अदालत नहीं लगनी है बस एक दो विषयों पर
आपका वर्जन चाहिए। अगर बहुत व्यस्त ना हों तो
बोले- नहीं आप इतनी दूर से आए हैं आपको मना नहीं करूंगा, सुबह 10 बजे सेक्रेटियट आ जाइयेगा - डायरेक्टर इन्फोर्मेशन से संपर्क कर लीजिएगा। वहीं इंटरव्यू कर लेंगे नाश्ता भी साथ करेंगे।
दूसरे दिन सुबह मैं सेक्रेटियट पहुंचा, एक इन्फोर्मेशन आफिसर पहले से ही गेट पर रास्ता देख रहा था दिल्ली के नंबर की गाड़ी देखते ही लपक कर हमारे पास पहुंचा कहा जीटीवी से हैं
मैने कहा- जी
आइये डायरेक्टर साहब आपका इंतजार कर रहे हैं
तब मुझे भरोसा हुआ कि कल रात जिससे बात हुई वो सचमुच शेखावत जी थे
डायरेक्टर इन्फोर्मेशन के पास चाय पी और साढे दस बजे शेखावत जी के सामने साक्षात पहुंच गया
दुआ सलाम हुई...11 बजे इंटरव्यू के लिए सेटअप तैयार हो गया...तब तक मैने भी शेखावत जी के साथ नाश्ता किया जो थोड़ा तगड़ा हो गया, एक दिन पहले जन्माष्टमी के व्रत की भूख नाश्ते में ही मिटी ।
नाश्ते के दौरान शेखावत जी ने कहा कि मुझे लग नहीं रहा कि रात में तुम्ही से बात हुई थी अभी क्या उम्र है तुम्हारी....मैने उम्र तो नहीं बताई धीरे से बोला कलम के सिपाहियों को पहलवान होना जरूरी तो नहीं...जोर से हंसे बोले - अब यकीन हो गया तुम्ही थे
मूड अच्छा देखकर मैंने कहा कि सुबह 9 बजकर 59 मिनट तक मुझे भी नहीं लग रहा था कि आप से बात हुई, मैं सोच रहा था कि टेलिफोन ऑपरेटर ने हमें रात में बुद्धू बनाया , और आपके नाम पर बात की...
क्यों ?
मैने कहा- अरे किसी राज्य का मुख्यमंत्री कभी सीधे फोन उठाता है,
वो फिर जोर से हंसे
माहौल एकदम हल्का हो गया था...मेरा भी हौसला बढ़ गया था
सेट तैयार था
हम दोनों बैठे
रोल हुआ
मैने पहला सवाल ही पूरा जोर लगाकर उड़ेल दिया - शेखावत जी आप पर आरोप लग रहा है कि आप राज्य की सांस्कृतिक विरासत को मिटाने पर तुले हैं....मसलन जेल की ऐतिहासिक इमारत को शॉपिंग कॉम्पलेक्स बनाने जा रहे हैं।
मैं शेखावत जी का चेहरा देख रहा था सोच रहा था अच्छी बाइट मिलेगी....20 सेकेंड बीत गए वो मुझे घूरे जा रहे थे ...मैं सोच रहा था धीर गंभीर व्यक्ति थोड़ा सोच कर बोलते हैं .... 4 0 सेकेंड बीत गए
मैने टोका - शेखावत जी
शेखावत जी गरजे-
-" मैं यहां का शेखावत हूं मेरे ऊपर कोई आरोप नहीं लगाता "
मैं तो सन्न रह गया , यहां तो बात व्यक्तिगत होने लगी थी ...मेरी पहली ही बाउंसर पर राजनीति के माहिर ने स्वीप लगा दी थी
मैने तुरंत संभाला और अगली ही बॉल स्विंग करा दी कांग्रेस की ओर-
जी शेखावत जी , लेकिन कांग्रेस तो आपको पानी पी पी कर कोस रही है इस मामले में
तब जाकर कहीं शेखावत जी का रुख मेरी ओर से हटकर कांग्रेस की ओर हुआ
मुझे बाइट तो बहुत मजेदार मतलब हार्ड हिटिंग मिल गई थी लेकिन मन ही मन थोड़ा डर रहा था कि कहीं बॉस से कुछ शिकायत ना कर दें। फिर भी मैं थोड़ा संभलकर दनादन सवाल दागता गया और वो भी दनादन जवाब देते गए.... 10 मिनट में इंटरव्यू निपट गया
इंटरव्यू खत्म हुआ तो वो फिर पहले जैसे ही सामान्य हो गए...कोई मीटिंग थी जरूरी फिर भी उन्होने बैठकर अपने हाथ से हिदी में एक चिट्ठी लिखी रजत शर्मा के नाम, मैने सोचा जरूर मेरी शिकायत लिखी होगी, क्योंकि वो रजत जी के बहुत करीबियों में से हैं ये मुझे पता था। चलते समय उन्होने मुझसे कहा कि अगली बार आना तो हमारे मेहमान बनना...मैने कहा- देखते हैं, कोशिश करूंगा
खैर सब कर कराकर मैं बाहर निकला - देखा चिट्ठी का लिफाफा बंद नहीं था
सबसे पहले चिट्ठी देखी, उसमें लिखा था -

प्रिय रजत जी,
काफी कोशिशों के बाद भी आप मुझे अबतक पकड़ नहीं पाए
लेकिन आपके रिपोर्टर रजनीकांत ने मुझे पकड़ लिया। छोटी सी उम्र में
जिस निर्भीकता और चतुराई से ये काम करते हैं उसने मुझे प्रभावित किया है।

भैरों सिंह शेखावत

उसके बाद मैं कई बार जयपुर गया लेकिन दोबारा मिला नहीं, 5-6 महीने बाद अचानक एक दिन दिल्ली में राजस्थान हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर का फोन आया कि- शेखावत जी की ओर से फेरी क्वीन में जाने का निमंत्रण है ...शनिवार को जाना है। पता नहीं उन दिनों खून में कितनी गरमी थी कहा भैरों सिंह जी को मेरी ओर से धन्यवाद कहिएगा लेकिन माफ कीजिएगा मैं सरकारी खर्चे पर यात्राएं और मौज मस्ती करने वाले पत्रकारों में नहीं हूं, मेरा मन नहीं करता...मुझे माफ करें
इस तरह शेखावत जी से दोबारा मिला तो नहीं लेकिन वो पहली और आखिरी मुलाकात आज भी ऐसा लगता है कि जैसे कल की ही बात हो ।
ईश्वर उस सरल, बेबाक और जिंदादिल इंसान की आत्मा को शांति दे।

- रजनीकांत मिश्र
15-05-2010




बुधवार, 4 जून 2008

जेठ की तपती दुपहरिया...

जेठ की तपती दुपहरिया
तवे सी तपती धरती,
कुएं पर बने छोटे से गड्ढे में

भरे पानी से
अपनी तृष्णा बुझाते गौरेया के बच्चे,
जो बीच-बीच में पंख फड़फड़ाकर
भिगो लेते हैं पंखों को
इस छोटे से गड्ढे में ही समा गई है शायद उनकी गंगा
दूर खलिहानों में बजती बैलों के गलों में बंधी घंटियां
गेहूं मांडता हरिया,
अनाज ओसाती हरिया की घरवाली
गेहूं को भूसे से अलग करता अंधड़

बार-बार
उतार देता है उसके सिर से घूंघट
लेकिन हर बार हवा का झोंका हौले से
हटा देता है उसका घूंघट,

पर वो बिना झुंझलाए उसी तरह उठाती है घूंघट
जैसे बाग-बार उठाती है मिला हुआ गेहूं और भूसा
सामने की पगडंडी से आती
हरिया की मुनिया
आज सोंधी रोटियों संग लाई है अमियों की चटनी

उधर जंगलजलेबी के पेड़ तले
नंगे पांव जूझते नंग धड़ंग बच्चे

जो कभी धरती की तपन से जल के
तो कभी
बिखरे कांटों की चुभन से
एक पांव उठाकर,
करते हैं असफल प्रयास,
एक ही पांव पर रुकने का
आम के पेड़ों में कूकती कोयल
नीमों पर लदी निबोरियां
सभी झुलसने का ले रहे हैं मजा
जेठ की तपती दुपहरिया में ।