बुधवार, 6 दिसंबर 2017

सौराष्ट्र में 12 लोगों का ओपिनियन पोल

                          गुजरात चुनाव को लेकर राजनीति गरमाई हुई है, हिंदू, मुस्लिम और मंदिर मस्जिद का मसाला खूब उड़ेला जा रहा है लेकिन क्या ये मुद्दे जनता जनार्दन की जीभ से होकर दिमाग तक पहुंचेंगे...
ये तो 18 दिसंबर के नतीजे ही बताएंगे लेकिन इन मुद्दों से पहले जनता की क्या राय थी ये जाना मैंने दक्षिणी गुजरात यानी सौराष्ट्र की यात्रा में – हालांकि यात्रा निजी थी और मकसद शुद्ध धार्मिक ...लेकिन हम कलम घिसने वालों को वहां भी चैन कहां...सो द्वारका, बेट द्वारका से लेकर सोमनाथ तक की यात्रा के दौरान मैं डरते डराते लोगों को ओपिनियन पोल करता रहा...10-12 लोगों का ओपिनियन पोल ऐसा था जिसकी मुझे कल्पना नहीं थी...मुझे कश्मीर भारत विरोधी माहौल में काम करने का 5-7 साल का अनुभव था इसलिए मेरे सवाल होते थे – क्या लगता है भावेश भाई, इस बार मोदी जी की हर बार की तरह बंपर जीत होगी गुजरात में ? मतलब सितंबर के महीने में मेरी ये पूछने की हिम्मत नहीं थी कि इसबार बीजेपी गुजरात में जीतेगी या हारेगी...खैर मेरे सवालों के मुझे जो जवाब मिल रहे थे वो बिल्कुल चौकाने वाले थे...कोई कह रहा था कि नहीं पहले जैसी जीत नहीं हो सकती, कोई कह रहा था यहां बीजेपी के सिवा कोई विकल्प ही नहीं तो कई ऐसे भी थे जो अपना अकेला वोट किसी और को डाल कर बीजेपी को हराने का दम भर रहा था..उनकी नाराजगी की वजह भी जीएसटी और आधार कार्ड के बिना बैंक खातों से पैसे ना निकालने देने के नियम थे, द्वारका में मैं जिस होटल में रुका था उसका मालिक जीएसटी से परेशान था, बताइये द्वारका जैसा छोटा सा कस्बा...यहां सिर्फ श्रद्दालु ही आते हैं जो एक दिन यहां रुक कर लौट जाते हैं, पहले ही ग्राहकों का टोटा रहता था अब जीएसटी ने रेट और बढ़ा दिए तो लोग क्यों होटल में ठहरेंगे । यानी अभी तक सब बिना टैक्स के ही चल रहा था....द्वारका होटल के सामने ही पहली मंजिल पर एक अच्छा रेस्टोरेंट था...अच्छा रेस्टोरेंट इसलिए कि वहां खाना तो अच्छा मिल ही जाता है पेमेंट भी डिजिटल हो जाता है, लेकिन यहां घुसते ही मैंने रिसेप्शन पर पूछा-
पेमेंट कार्ड चल जाएगा,
वो बोला ना भाई ओन्ली कैश ...
.कैश तो है नहीं मेरे पास
आप ऑर्डर कर दो ...मंदिर कंपाउंड में ही HDFC का एटीएम है ..अधर बाजू मार्केट में SBI एटीएम है आप निकाल लो  
यानी यहां भी खाता ना बही....बाकी सब सही
द्रारका से बेट द्वारका जाने के लिए टैक्सी ली. रास्ते में ड्राइवर से बतकही शुरू की...
वो तो लगता था भरा ही पड़ा था....जीएसटी, नोटबंदी, आधार सब गिना डाले भाई ने
जहां जहां मैं डरते डरते सवाल पूछता था...वहीं थोड़ी देर में बीजेपी के बचाव की मुद्रा में आ जाता था
अरे इससे टैक्स आएगा, अरे इससे काला धन रुकेगा... जैसी मेरी दलीलें कोई मानने को तैयार नहीं था. बेट द्वारका के लिए फेरी पर सवार हुआ, बेट द्वारका के रहने वाले एक बुजुर्ग दंपत्ति मेरे साथ ही बैठे थे...मैने धीरे से उनसे बातचीत शुरू हुई पता चला दोनों ओखा गए थे, आधार कार्ड जुड़वाने ...मेहनल मजदूरी करने वाले बुड्ढे, बुढिया दोनों के अंगुलियों के निशान मशीन पकड़ ही नहीं पा रही है, दोनों गहरे सदमे में हैं, हाथ की लकीरों को उन्होंने इससे पहले कभी इतना नहीं कोसा होगा जितना आज कोस रहे हैं..वो भी तब जब लकीरें मिट गई हैं... मायूस बुढिया मेरी तरफ देखकर बोली- मतलब मेरा पैसा डूब गया....मैंने उसे समझाया नहीं नहीं – पैसा कहीं नहीं जाएगा...उंगलियों के निशान नहीं मिले तो कोई बात नहीं...आंखों की पहचान से हो जाएगा...ये भी नहीं हुआ तो भी कुछ नहीं होगा पैसा कहीं नहीं जाएगा....बुड्ढे ने बड़बड़ाकर बुढिया को गुजराती में ही कुछ कहा...फिर दोनों चुप हो गए...बुड्ढा गुजराती में ही किसी और से बात करने लगा....मैंने धीरे से बुढिया से पूछा कि क्या बोला अभी बुड्ढा ....वो धीरे से बोली- कह रहा है कि ये भी दिल्ली वाला है इसकी बातों में मत पड़...ये भी बातें ही फेंक रहा है” ….मुझे बुड्ढे पर बहुत गुस्सा आया मैं तो उसे समझा रहा हूं वो मुझे दिल्ली से आया फेंकू बता रहा है...बहरहाल नाव आधे घंटे में बेट द्वारका पहुंच गई...दर्शन किए
द्वारका फिर लौट आया .
दूसरा दिन –
दूसरे दिन मुझे सोमनाथ जाना था सुबह सुबह 6 बजे उठा होटल वाले ने कहा चाय 7 बजे के बाद ही मिलेगी, अभी जरूरी हो तो गोमती होटल के सामने चायवाला है वहां से ले लें....होटल के बाहर चायवाला बड़े आराम से चाय बेच रहा था...ये अचंभा भी द्वारकाधीश की नगरी में ही संभव है...बाकी देश की नगरी में कहीं संभव नहीं था, फीकी चाय बोली, सिगरेट मुंह में दबाई...बोला चाचा पेटीएम कर दूं.....चायवाला बोला समझ में नहीं आया..चाय में कुछ और डालना है क्या..इलायची तो डाला है
मैंने उसे हाथ से इशारा किया नहीं कुछ नहीं वो टूटे पैसे नहीं हैं – 500 का नोट है 10 रुपये की चाय के लिए 500 का नोट ठीक नहीं लगता ना....अब तक मेरा हौसला बढ़ चुका था... मैंने कोसना शुरू किया मोदी जी ने तो ऐसा बरबाद कर दिया है कि एटीएम से निकालो तो 100 रुपया निकलता ही नहीं सीधे 500 का निकलता है अब क्या करूं इसको चांटूं ...?
लेकिन हाय रे मेरा दुर्भाग्य यहां भी मेरा दांव उल्टा पड़ गया, चाय वाला बोला 500 का हो या 2000 का मुझे दो मैं चेंज दूंगा- मोदी जी को क्यों कोस रहा...वो आदमी बहुत अच्छा है देश का भला कर रहा है...कुछ लोग देश में अच्छे लोगों को काम करने नहीं देना चाहते और ऐसे ही लोग विरोध कर रहे हैं....मैंने तमाम दलीलें रखी जीएसटी, आधार, नोटबंदी...उसने सब काट दीं...मैंने अंत में पूछा – चाचा, चायवाले के नाते उसका पक्ष तो नहीं ले रहे ना...वो बोला मुझे इससे मतलब नहीं कि वो चायवाला है या देश का पीएम...सही बात को सही ही कहूंगा....मैंने पूछा तो चाचा टैक्स देते हो...मोदी जी कहते हैं कि सबको टैक्स देना चाहिए...अब वो पीछे हट गया...मैं यहां लोगों को चाय पिलाता हूं

किसी तरह रोटी का जुगाड़ करता हूं ...मैं क्या टैक्स दूंगा...मैं हाथ में चाय का कप लिए होटल की ओर चल दिया....                 

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..





इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..

जग में फैले अंधकार को आओ दूर भगाएं

मारकाट के तम से देखो स्याह पड़ा है नभ मंडल

दीप एक जलाकर आओ इस नफरत को आज मिटा दें

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..


हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई के नामों पर फैला बहुत है अंधियारा

भाईचारे का एक दीप जलाकर इस तम को भी मार भगाएं

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..


भ्रष्टाचार और लालच का दानव भी खूब फलफूल रहा

अहंकार का रावण भी तो महीने भर पहले ही फूंका था

एक बार फिर बढ़कर उसने आसमान का चूमा है

एक दीप इस अहंकार के नाम भी आज हमें जलाना है

अहंकार के रावण को इस दीवली मार गिराना है

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..



कोई रटता मंदिर-मंदिर, कोई काबा काबा

फिर भी इनके मन में बैठा अंधकार ना भागा

आओ हम सब एक दीप अपने मन मंदिर में भी जलाएं

मन में बैठे महातिमिर को खुद से दूर भगाएं

इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..



अपने घर में घी के दीयों से उतनी खुशियां ना मिल पाएंगी

किसी गरीब के घर एक दीप जलाने से जितनी हम तक आएंगी



इस दीवाली आओ हम सब मिलकर दीप जलाएं ..

बुधवार, 3 अगस्त 2016

ऐ शहर कोई ना कहेगा अब तुझे 'बुलंद'शहर

ऐ शहर कोई ना कहेगा अब तुझे  'बुलंद'शहर
हम तो कहेंगे तुझे आदम शहर
लेकिन नहीं, आदम कितने भी अनपढ़ जाहिल रहे हों,
लेकिन इतने पाशविक तो कभी नहीं रहे होंगे;
किसी मां को, किसी १३ साल की बेटी को नहीं बनाया होगा
 उन्होने कभी शिकार
उस आदिम युग के किसी बाप को नहीं सुननी पड़ी होगी
दरिंदों का शिकार हो रही बेटी का चीत्कार,
और उस युग में किसी मां ने भी नहीं देखा होगा
अपने कलेजे का ऐसा बलात्कार
क्यों नहीं देखा होगा, मैं आपसे पूछ रहा हूं क्यों नहीं देखा होगा ?
क्योंकि वो बुलंद'शहर में नहीं जंगलों में रहते थे,
मैं कहता हूं मिटा दो ये शहर, मिटा दो ये कस्बे
आओ फिर जंगलों में लौट चलें
लेकिन उससे पहले उन सभी दरिंदों को मेरे हवाले कर दो,
उन्हें इस देश का कानून सजा नहीं दे पाएगा,
हम उन्हें जंगल में ले जाएंगे,
उन्हीं जंगलों में जहां उन्होने उस हैवानियत को अंजाम दिया था,
मैं उसी जगह ले जाकर उनका इंसाफ करूंगा, मौत नहीं दूंगा,
वो सजा दूंगा कि सुनकर जिसे याद कर पापियों के हाथ थर्राने लगें,
मुझे जंगलों में लौटना है,
जल्दी करो इस शहर में मेरा दम घुट रहा है
मुझे जंगलों में लौटना है,
जल्दी उन पापियों को मेरे हवाले कर दो।
मुझे जंगलों में लौटना है ।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं ...


लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं ...

लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं
पिछले दो एक हफ्तों से मुझे लगने लगा है
कि हवाएं अचानक अपना रुख बदलने लगी हैं
सूरज की तपन अचानक फिर बढ़ने लगी है
हर दिशाओं में शोर बढने लगा है
आसमान के नीलेपन में भी लाली छाने लगी है

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..


सड़क किनारे नागफनियों में कांटे बढ़ने लगे हैं
नन्हें पेड़ पौधे भी कुम्हलाने लगे हैं
बड़े दरख्तों की कोमल फुनगियां भी मुरझाने लगी हैं
फूलों के रंग उड़ने लगे हैं, कलियां खिलने से खौफ खाने लगी हैं

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..

नुक्कड़ों पर नजर आने वाले बुजुर्गों के गुट भी छितराने लगे हैं
अब शर्मा जी और खान साहब दूर-दूर नजर आते हैं
पड़ोस वाले नकवी साहब, पंडित जी से नजरें चुराते हैं

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..

अचानक जान पहचान वाले मुझे बताने लगे हैं कि ये हिंदू है
और वो मुसलमां है

अचानक मोहल्ले के मंदिर और मस्जिदों पर टंगने लगे हैं भोंपू

आयतों और आरतियों से मोहल्ला गूंजने लगा है



अचानक काले कारनामे करने वाले शोहदे ने पहनने शुरू कर दिए हैं झक्क सफेद कपड़े

अब वो मुझे देखकर पहले की तरह आंखे भी नहीं तरेरता,
झूठी मुस्कान के साथ बस हाथ जोड़ लेता है ...
पहले मुझे उससे डर नहीं लगता था लेकिन अब बहुत डर लगता है

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..


अचानक हर शहर में गायों भरे ट्रक पकड़े जाने लगे हैं
पता नहीं ट्रक वाले ही गायों को पकड़वा रहे हैं
या पकड़ने वाले ही ट्रकों को भर-भरकर ला रहे हैं
ना जाने वो कौन हैं जो बेगुनाह बेजुबानों को कटवा रहे हैं

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..


अचानक चीजों के दाम दोगुने हो गए हैं
दाल, चावल, आटा आसमां में उड़ रहे हैं
आलू, टमाटर, टिंडे जमीन पर अपने अपने रंग दिखा रहे हैं
दुकान का सेठ – अपने मुनीम को समझा रहा है
10 पेटी इलेक्शन खर्चे के लिए भी निकालना है

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..

जाने क्यों मुझे लगता है फिर चुनाव आने वाले हैं..




रविवार, 9 अगस्त 2015

बीजेपी के भाग से बिहार का छींका टूटेगा ?


गया के गांधी मैदान से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के लोगों को विकास के खूब सपने दिखाए. सपने भी दिखाए और बिहार की नीतीश सरकार को जमकर कोसा भी...मोदी ने कहा 25 साल से इन्हीं लोगों ने बिहार पर राज किया है और नतीजा ये कि बिहार दिन पर दिन पिछड़ता चला गया । हालांकि भाषण देते वक्त पीएम मोदी ने इस बात को जानबूझकर भुला दिया कि बिहार में नीतीश कुमार के साथ कंधा मिलाकर बीजेपी ने भी करीब 8 साल गठबंधन की सरकार चलाई है। मोदी ने कहा कि बिहार अभी भी बीमारू राज्य है और राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह अगर बिहार को भी इस सूची से बाहर लाना है तो यहां भी बीजेपी की सरकार बनवानी होगी। मोदी के दावे पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने पलटवार किया है, दावे को गलत बताते हुए उन्होंने कहा है कि बिहार अब बीमारू राज्य नहीं है, नीतीश ने पूछा कि क्या केंद्र केवल उन्हीं राज्यों को मदद करेगा जहां उनकी पार्टी की सरकार है ।
पीएम मोदी ने कहा दिल्ली से विकास की गंगा लगातार बिहार की तरफ बह रही है लेकिन नीतीश सरकार तो उल्टा लोटा लिए खड़ी है जो इससे कुछ हासिल ही नहीं कर रही है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालू यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार में जंगलराज- 2 शुरू हो रहा है और जेल से बुरी बुरी चीजें सीख कर लौटे लोगों के जरिए जहर फैलाया जा रहा है । मोदी के जेल वाले इस बयान पर लालू यादव और नीतीश कुमार ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को लपेट लिया , लालू ने पूछा है कि अमित शाह जेल से क्या सीख कर लौटे थे एक बार उन्हीं से पूछ लें । बीजेपी की आंखों की किरकिरी बन चुके नीतीश और लालू के गठबंधन पर भी पीएम ने निशाना साधा, पीएम ने पूछा जिन लोगों ने अभी जहर पिया है वो बाद में किसपर निकालेंगे । दरअसल बिहार में नीतीश से गठबंधन के बाद लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि उन्होने जहर पिया है, नीतीश के चंदन और भुजंग वाले बयान को लेकर भी मोदी ने तंज कसते हुए पूछा कि कौन चंदन कुमार है और कौन भुजंग प्रसाद मुझे तो पता ही नहीं। दरअसल बिहार में नीतीश और लालू की दोस्ती बीजेपी के लिए एक नई मुसीबत बन कर खड़ी हो गई है, उसका बिहार में जीत का सपना धुंधलाने सा लगा है लेकिन बीजेपी को अभी भी उम्मीद है कि किसी तरह बिल्ली के भाग से गठबंधन का छींका टूट जाए जिससे बिहार की मलाई एक बार उसे अकेले चट करने का मौका मिल सके, हालांकि लालू और नीतीश की जोड़ी उन्हें ये मौका देगी इसमें थोड़ा संदेह है।

सोमवार, 3 अगस्त 2015

फर्स्ट डिवीजन की मौत !

IIT रुडकी के छात्र महीने भर के ड्रामे के बाद आखिर वापस ले लिए गए....भले हालात कुछ दूसरे हों लेकिन जिस दिन से ये मामला सामने आया था उसी दिन से मुझे अपने वो दोस्त याद आने लगे जो करीब ३० साल पहले अचानक गुमनामी में खो गए, आज तक ना उनका कोई फोन आया ना किसी से उनके बारे में सुनने को मिला, क्या किया होगा, क्या उन्होने नदी में कूद कर जान दे दी होगी या किसी ट्रेन के नीचे लेट गए होंगे। अगर ऐसा हुआ होगा तो सिर्फ उस शख्स के पीछे जिसे छात्रों के भविष्य ये ज्यादा अपने स्कूल की झूठी इज्जत की चिंता थी। कहानी लखनऊ के एक नामी स्कूल से जुड़ी है नाम बताना उतना जरूरी इसलिए भी नहीं क्योंकि जिन तक ये बात पहुंचानी है उनको इसमें अपनी आत्मा जरूर दिख जाएगी, हां तो १९८५ के आसपास की बात होगी, नौवीं पास कर हम दसवीं में गए थे, हमें सुबह ८ बजे से शाम ६ बजे तक स्कूल नें ही पढना होता था, पढने के बजाय घोटा लगाना कहें तो ज्यादा सही होगा, क्योंकि हाईस्कूल की पढाई के लिए कितनी देर पढने की जरूरत होती है.......लेकिन हमारे स्कूल में तो कुछ बच्चों को तस्कूल में ही बिस्तर तक लगवा दिए गए, और जो बच्चे इसके बाद भी तोतों को रटाने वाले रिंग मास्टरों को कम से कम फर्स्ट डिवीजन लाने का भरोसा नहीं दिला पाए उन्हें स्कूल छोडने का आदेश सुना दिया गया, इनमें से कई केजी नर्सरी से इसी स्कूल में पढ रहे थे, बहुत रौए गिडगिडाए, उन्ही मां बापों ने आकर उनके पांव भी पकडे जिन्हे तराजू में फल फूल से तौलने का स्कूलवाले ढकोसलेबाज नाटक रचते थे, लेकिन विश्व शांति का लबादा ओढकर घूम रहे मार्केटियरों को जरा भी दया ना आई, २५-३० बच्चों को एक झटके में निकाल दिया गया, आखिर क्यों किस बात का गुरूर था उन्हें, छटनी पहले पांचवीं में, फिर आठवीं में, फिर नवीं में ......फिर भी दिन रात रटाने वाले बच्चों को भी अपनी उम्मीदों पर ढाल नहीं सके तो ये बच्चों की नहीं रिंगमास्टरों की गलती है, जिस लडके ने हाईस्कूल में पूरे यूपी में टॉप किया वो अगले साल फर्स्ट डिवीजन भी नहीं ला सका, गलती उस लडके में नहीं स्कूल के सिस्टम में थी, इधर बीच सेशन में निकाले गए लडकों को कहीं दाखिला मिल नही सकता था, सो लोग मारे मारे घूमते रहे साल बरबाद हुआ होगा, कुछ इस जिल्लत में आत्मा से मर गए होंगे, कुछ नफरत की आग में जल गए होंगे, ३० साल बाद नाम तो किसी के याद नहीं लेकिन उनके वो दर्द भरे चेहरे आज भी याद हैं, इव सब के कत्ल का जिम्मेदार जो भी हो उसे ईंट पत्थर की अदालतों में शायद सजा ना दी जा सके लेकिन कुदरत उनका इंसाफ जरूर करे, जिन मां बापों की आंखों के सपने छिने उनके गुनहगारों को कुदरत वैसी ही सजा दे। स्कूल के मेरे कुछ दोस्तों कुछ अध्यापकों को शायद मेरी बातें अच्छी ना लगें उनसे मैं माफी चाहता हूं लेकिन क्या करूं फर्स्ट डिवीजन का शोकेस लगाकर अपनी दुकान चमकाने और बचपन की हत्या करने वालों का असली चेहरा भी तो सामने लाना जरूरी है। स्कूल के २०० बच्चों में से छाटकर १०० बच्चों को अव्वल दिखाना कोई बड़ा काम नहीं है, हम तो तुम्हें तब गुरु मानेंगे जब सारे २०० बच्चों को तुम अव्वल वाले मुकाम पर पहुंचा दोगे।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

जब राजेंद्र यादव को कसाई बना दिया था मैंने…. !

दिल्ली- नोएडा के बीच आपको सुबह-शाम यात्रा करनी हो तो किसी सरदर्द से कम नहीं, भयंकर जाम हर सड़क पर मिल जाएगा, किसी तरह मोटरसाइकिल से दफ्तर पहुंचा तो साढे नौ बज रहे थे, अपनी सीट पर पहुंचा..टीवी बंद पड़ा था, ऑन किया 9.30 की हेडलाइन चल रही थी, आखिरी हेडलाइन आते आते टीवी ऑन हुआ तो सामने देखा राजेंद्र यादव जी के ना रहने की दुखद खबर थी...अरे मुझे सुबह से तो पता ही नहीं चला.. ओह याद आया आज सुबह से घर पर लाइट नहीं थी, इन्वर्टर 42 इंच के टीवी का लोड लेते ही ट्रिप होने लगता है इसलिए चाहकर भी टीवी नहीं खोला था....मैंने अपने सहकर्मी से तस्दीक की- ...अरे राजेंद्र यादव जी नहीं रहे ....यकीन नहीं हो रहा मुझे आज दिन भर वो दिन याद आता रहा ...जब मैं राजेंद्र यादव जी से पहली बार मिला था, और पहली बार में ही अपने अंदर उनकी जो छवि मैंने बना रखी थी, उनके सामने उसे पेश कर दी, वो भी एक कार्टून के रूप में, उस कार्टून में उनपर जबरदस्त कटाक्ष था, फिर भी उन्होंने बड़े ही प्यार से उसपर दस्तखत किए और मुझे प्यार से लौटाया ये कहकर कि इसकी एक फोटो कॉपी उन्हें भी दे दूं । आज मैं अपने पुराने कागजों में वो कार्टून ढूंढ रहा था लेकिन अभी तक मुझे मिला नहीं। बात उन दिनों की है जब मैं आईआईटी कानपुर में टेलिविजन सेंटर में ट्रेनिंग कर रहा था, साहित्य की रुचि मुझे शुरू से ही थी आईआईटी में तो माहौल ही अलग था, साहित्य तो दूर की चीज थी राजनीति की चर्चा भी कम ही सुनाई पड़ती थी, एक लेक्चर हॉल से दूसरे हॉल के बीच साइकिल पर घूमते प्रोफेसर और छात्र एल्फा, बीटा, गामा की लेन में ही रोबोट की तरह चलते नजर आते थे। लेकिन एक प्रकृति के लोग जब एक जगह होते हैं तो मिल ही जाते हैं ऐसा ही हुआ, उन दिनों में आईआईटी में साहित्यकार गिरिराज किशोर जी भी थे, वो क्रिएटिव राइटिंग विंग के सर्वे सर्वा थे, उन्होने एक हिंदी कविता कार्यशाला का आयोजन किया था, रजिस्ट्रार दफ्तर के पास दीवार पर चिपके नोटिसों में से ये नोटिस चिपका देखकर मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि आईआईटी जैसे माहौल में भी कोई कविता, कहानी की बात कर सकता है, इसी कार्यशाला में से मुझे 2-4 दोस्त ऐसे मिले जो आईआईटी से एमटेक या पीएचडी कर रहे थे, उनमें मिलकर मुझे पता चला कि भले वो कंप्यूटर की मशीनी भाषाओं कोबोल, यूनिक्स के बीच रहते हों लेकिन उनके दिल में साहित्य जिंदा था। धीरे धीरे मैं भी 3-4 लोगों के साथ मिलकर मशीनी दुनिया के दोस्तों के साथ साहित्य की पौधों को रोपने लगा था। आईआईटी में हिंदी साहित्य का कारवां यहीं से शुरू हुआ- गिरिराज किशोर जी से मिलकर राजेंद्र यादव, नरेश सक्सेना जैसे तमाम साहित्यकारों को आईआईटी में बुलाया जाने लगा ताकि यहां के छात्र उनसे मिलजुलकर साहित्य के बारे में जान सकें। राजेंद्र यादव जी के आने की खबर हमें पहले से थी, मैं हंस का नियमित पाठक था, भले खरीद कर नहीं पढ़ता था, लेकिन हॉल -4 के रीडिंग रूम में रखी हर हंस का अंक मैंने पूरा पढ़ा था। उस दन गेस्ट हाउस में हम लोग शाम के वक्त राजेंद्र जी से मिलने पहुंचे, बातचीत शुरू हुई .... हम लोग अपनी जिज्ञासाएं उनके सामने रख रहे थे वो बड़े ही प्यार से हमारी बातों का जवाब दे रहे थे, मैं बातचीत नोट भी कर रहा था, लेकिन मेरे नोट पैड के बीच रखा कार्टून बार बार सामने आने को बेताब हो रहा था, मुझे डर भी था कि कार्टून देखते ही वो नाराज हो सकते हैं इसलिए पहले ही तय कर लिया था कि कार्टून कांड सबसे आखिर में ही किया जाए। हमने राजेंद्र जी को शॉपिंग सेंटर में बने एकमात्र रेस्टोरेंट में डिनर के लिए भी मना लिया था। डिनर के बाद हम गेस्ट हाउस फिर लौट आए, राजेंद्र जी ने अपना सिगार फिर सुलगा लिया था...अब वो बेड पर अधलेटे से थे और हम चारों लोग कुर्सियों पर बैठे थे ....जब मैं आश्वस्त हो गया कि राजेंद्र जी हम लोगों से काफी घुल मिल गए हैं तो मैंने बड़ी हिम्मत कर राजेंद्र जी से धीरे से कहा कि मैंने आपका एक कार्टून बनाया है आप देखना चाहेंगे...मैंने कार्टून निकालकर उनकी ओर बढ़ा दिया....पहले वो चौंके फिर देरतक देखने के बाद मुस्कुराए...और बोले...ओह तो आप मुझे इस नजर से देखते हैं...तुमने तो मुझे कसाई ही बना दिया और फिर जोर से हंसे...ओह तो आपने मुझे कसाई ही बना दिया... ! दरअसल हंस पढ़कर मुझे पता नहीं क्यों लगता था कि इसमें अश्लीलता का पुट जानबूझकर डाला जाता है, मुझे लगता था कि प्रेमचंद्र जी के हंस को राजेंद्र जी ने अश्लील बना दिया है, मैंने जो कार्टून बनाया था उसमें लकड़ी के एक गोल बेस पर एक हंस को दोनों पैरों पर खड़ा बनाया था....बगल में राजेंद्र यादव एक बड़ा चाकू लेकर खड़े हैं और हंस के दोनों पंख कटे नीचे पड़े हैं...हंस के दोनों स्तनों को देखकर राजेंद्र जी मुस्कुरा रहे हैं.. राजेंद्र जी ने उसके बाद हमें प्यार से समझाया कि साहित्य में वो सबकुछ होना जायज है जो हमारे समाज में है, जो हमारे समाज से घट रहा है अगर वो साहित्य में दर्ज हो रहा है तो इसमें हर्ज क्या है, आइने का और क्या काम होता है। राजेंद्र जी ने उस कार्टून पर दस्तखत किए और मुझसे कहा कि इसकी एक कॉपी उन्हें भी दे दूं...मैं दूसरे दिन एक डाक्यूमेंट्री शूटिंग के सिलसिले में बाहर चला गया और उन्हें कॉपी नहीं दे पाया, हालांकि बाद में मैंने उन्हे कोरियर से कॉपी भिजवाई पता नहीं उन्हें मिली थी या नहीं ....!