सोमवार, 7 जून 2010
मजबूरी में पत्रकार नहीं बना मैं....
मैं पत्रकारिता के पेशे में मजबूरी से नहीं आया था, ऐसा नहीं था कि पहले इंजीनियरिंग की कोचिंग की फिर आईएएस के लिए ट्राई किया और जब कहीं सफलता नहीं मिली तो मजबूरी में रोजी रोटी चलाने के लिए पत्रकार बन गया। आज पत्रकारिता में बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन मेरा मामला ही कुछ अलग था। बीएससी की पढाई करते-करते दर्जन भर अखबारों में लिखने के अलावा एक हिंदी अखबार में रिपोर्टिंग का काम भी मिल गया था। क़ॉलेज से छूटने के बाद जब साथी सिनेमाघरों का रउख करते तब मैं अखबार के दफ्तर में बैठकर खबरें लिखता और पहले शाम फिर देर रात तक घर लौटने लगा। मेरे पिता जी पेशे से पशु चिकित्सक हैं चाहते थे कि मैं डॉक्टर या इंजीनियर बनूं लेकिन मैने उन्हे मना कर दिया कि इनमें मेरी कोई खास रुचि नहीं है। पिताजी ने बीएससी खत्म होते ही एक महंगे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग कोर्स में दाखिला करवा दिया, अब इतनी फीस दी थी तो कोर्स पूरा किया और जितना खर्च हुआ था उतना कंप्यूटर से कमा कर दे दिया और कंप्यूटर को बाय बोल दिया - 0 से 9 के बीच मैं सारी जिंदगी काट नहीं सकता था ।
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3 टिप्पणियां:
nice
aap lucky ho ki aapko apni pasand ka kam karane ko mila!!!!!!
Thanx
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